दिल्ली ऊँचा बोलती है

रवि अरोड़ा

राजधानी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से छन छन कर कुछ ख़बरें और कभी कभी अफ़वाहें मुझ तक भी पहुँचती हैं । कई दफ़ा वह विद्वेष जन्य होती हैं तो कई बार गहरे राजनीतिक विश्लेषण से कम भी नहीं होतीं । वैसे तो मैं अक्सर इन ख़बरों को भूल जाता हूँ मगर फिर भी कभी कभी दिमाग़ के किसी बर्फ़ीले कोने में वे ज़िंदा भी रह जाती हैं । आज मन हुआ कि इन ख़बरों अथवा अफ़वाहों को आपसे भी साझा करूँ ताकि आप भी जान सकें कि दिल्ली बेशक ऊँचा सुनती हो मगर जब बोलती है तो ऊँचा बोलती भी है । अब यह आपके विवेक पर है कि दिल्ली के ऊँचे बोलों को आप कोरी बकवास मान भूलना पसंद करेंगे अथवा इन्हें कम से कम साँस लेने के लिए दिमाग़ में कोई स्थान देंगे ।

पहली चर्चा तो यही मुझ तक पहुँची है कि भाजपा हाईकमान को अंदेशा हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में वर्तमान परिस्थितियों के चलते कम से कम सौ सीटों का नुक़सान हो सकता है । अकेले उत्तर प्रदेश में चालीस से पचास सीटें कम आ सकती हैं और राजस्थान , बिहार और पश्चिमी बंगाल जैसे राज्यों में प्रत्येक जगह पाँच से दस सीटों का घाटा होगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपने गढ़ गुजरात में भी दो से पाँच सीटें कम हो जाएँगी । यह आँकड़ा पाँच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के परिणाम से थोड़ा घट-बढ़ भी सकता है । राफ़ेल सौदे पर हो रहे विवाद को विपक्ष बोफ़ोर्स जैसा गर्म कर सका तो घाटा और भी बढ़ सकता है । हालाँकि पार्टी हाईकमान ऊपर से पूरा आत्मविश्वास दिखा रहा है मगर अंदर ही अंदर डरा हुआ है । इसी डर के चलते उसने कुछ बड़े क़दम उठाने का फ़ैसला किया है । पहला क़दम तो यह है कि किसी निजी एजेंसी से सर्वे करा कर ख़तरे वाली सीटी पर प्रत्याशी बदले जाएँगे ।यह काम पूरी बेदर्दी से होगा और कई मंत्री भी इसकी चपेट में आएँगे । चूँकि दिल्ली की गद्दी का रास्ता यूपी से गुज़रता है अतः सबसे अधिक काम यहीं किया जाएगा । भाजपा को उम्मीद थी कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के रहते राममंदिर पर कोई महत्वपूर्ण निर्णय हो जाएगा मगर एसा हो नहीं पा रहा और अब आगामी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई से उन्हें इसकी ज़रा सी भी आशा नहीं है सो पार्टी का विचार है कि अब संसद अथवा विधेयक के ज़रिये मंदिर का शिलान्यास तो करा लिया जाए ताकि जनता के बीच यह संदेश पहुँचे कि कम से कम एक वादा तो सरकार ने पूरा कर ही दिया । पार्टी सबसे अधिक यूपी को लेकर ही डरी हुई है और यहाँ विपक्षियों के सम्भावित गठबंधन ने भी उसकी नींद हराम की हुई है । अपनी लाज बचाने के लिए पार्टी के पास एक ही रास्ता है और वह यह कि किसी भी सूरत इस गठबंधन में फूट डाली जाए । इस मामले में बसपा उसके लिए सॉफ़्ट टारगेट हो सकती है अतः मायावती की पुरानी फ़ाइलें खंगाली जा रही हैं और विभिन्न एजेंसियों को उनके पीछे लगाया जा रहा है । पार्टी हाईकमान चाहता है कि मायावती यदि साथ न भी आयें तब भी गठबंधन से अलग तो हो ही जायें । दबाव असर दिखा भी रहा है और मायावती ने छत्तीसगढ़ में अजित जोगी से गठबंधन कर इसके संकेत भी दे दिए हैं । मायावती को दबाव में लेने के लिए ही भीम सेना के चंद्रशेखर को हाल ही में जेल से रिहा किया गया । अखिलेश को कमज़ोर करने के लिए शिवपाल यादव को आगे बढ़ाने की भी कोशिशें शुरू की गई हैं और परदे के पीछे से अमर सिंह यह काम देख रहे हैं ।

अगड़ा बनाम पिछड़ा अथवा सवर्ण बनाम दलित की समाज में बढ़ती चर्चाओं को थामने और भारी संख्या में नोटा के इस्तेमाल की आशंकाओं के चलते नोटा का प्रावधान मतदान से हटाने पर भी विचार हो रहा है । छोटी जातियों को साधने का काम ख़ुद संघ ने संभाला है और हाल ही संघ प्रमुख के दिल्ली में हुए तीन दिवसीय व्याख्यान से एसे संकेत भी निकले हैं । मुस्लिम मतदाताओं को बेशक साधना पार्टी के लिए मुश्किल भरा है मगर तीन तलाक़ पर क़ानून बना कर मुस्लिम महिलाओं को अपने प्रति सॉफ़्ट किया जा रहा है । उधर पूरे चार साल पार्टी के आईटी सेल ने राहुल गांधी को पप्पू साबित करने की जी तोड़ कोशिश की मगर धीरे धीरे ही सही लेकिन जनता राहुल को गम्भीरता से लेने लगी है । यही कारण है कि राहुल को लेकर पार्टी अब अपनी नीति बदल रही है उनके ख़िलाफ़ कोई बड़ा आरोप तलाश रही है ।

मैं जानता हूँ कि इन बातों में से अनेक बातें आपको चंडूखाने की लगी होंगी । मुझे भी एसा ही लगा । मगर जब दिल्ली इतनी ऊँची आवाज़ में सुबह शाम यह बोल रही है तो सुनना तो बनता ही है।

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