राजा का पाप

रवि अरोड़ा

क्षमा करें राजा साहब मगर आज आपको रामायण के उत्तर कांड का एक प्रसंग सुनाने का मन हो रहा है । शम्बूक़ के वध वाले इस प्रसंग के अनुरूप राजा राम के शासनकाल में एक ब्राह्मण के इकलौते बालक की अकाल मृत्यु हो गई थी । दुःखी ब्राह्मण ने अपने पुत्र का शव राज दरबार के बाहर लाकर रख दिया और कहा कि राम राज में जब किसी की अकाल मृत्यु नहीं हो सकती तो फिर मेरे पुत्र के साथ एसा क्यों हुआ ? ब्राह्मण का आरोप था कि हो न हो राज अथवा राजा के किसी पाप के कारण एसा हुआ है । राजा राम ने अपना पाप किस रूप में स्वीकारा और उसका समाधान कैसे किया, कृपया इसे जाने दें और राजा के पाप पर ही थम जायें । बात तो केवल इतनी ही है न कि एक बालक की अकाल मृत्यु पर राजा राम इसे अपने राज के दुष्कर्म के रूप में स्वीकार करते हैं और अपने युग के प्रावधानों के अनुरूप उसका निराकरण करते हैं । महोदय इस प्रसंग की चर्चा का मेरा मंतव्य केवल इतना ही है कि युगों पश्चात भी आप जिस रामराज के सपने हमें दिखाते हैं उसके अनुरूप अपना पाप क्यों नहीं स्वीकार करते ? तब तो केवल एक बालक की अकाल मृत्यु हुई थी और अब तो केवल दिल्ली में ही प्रतिदिन साठ से अधिक लोग प्रदूषण से मर रहे हैं । साँस के रोगियों से तमाम अस्पताल भरे पड़े हैं और हर कोई स्मोकर हुआ घूम रहा है । छोटे छोटे बच्चे तक बीस बीस सिगरेट जितना धुआँ रोज़ाना अपने फेफड़ों में धकेल रहे हैं । राजा जी आख़िर यह किसका पाप है ?

राजा जी मानता हूँ कि कुछ खोट हममें भी है मगर क्या सारा दोष हमारा ही है ? हम तो आपके पीछे पीछे ही चलते हैं न ? आप कहते हो हेल्मेट पहनो , हम पहनते हैं । आप कहते हो सीट बेल्ट लगाओ, हम लगाते हैं । आप कहते हो रेड लाइट पर रुको, हम रुकते हैं ।आप कहते हो ओड-इविन के हिसाब से गाड़ी घर से निकालो, हम करते हैं ।, हमसे भूल होती है तो आप जुर्माना करते हो, हम भुगतते हैं । कुल जमा यह कि आप जो जो कहते हो हम करते हैं । राजा जी स्वीकार करता हूँ कि जिनके पास चार पैसे नये नये आये हैं , वे क़ायदा-क़ानून कुछ नहीं समझते । अपनी हैसियत दिखाने को मुँह पर रुमाल बाँध कर दिवाली पर ये लोग पटाखे जलाते हैं और हर वह काम करने में अपनी शान समझते हैं , जिसके लिए मना किया जाये । मगर राजा जी नियम क़ानूनो का पालन कराना किसका काम है ? दंड देने की शक्ति किसके पास है ? गोस्वामी तुलसी दास ने क्या हमारे लिये ही कहा था- भय बिन प्रीत न होत गोसाई ? वैसे क्षमा करें राजा जी बुरा न मानें तो कहूँ कि आपसे मच्छर तक तो मरता नहीं और आप बातें हमेशा बड़ी बड़ी करते हैं । जनाब एसा कोई आदमी तो ढूँढ कर लाइये जिसके आसपास कोई डेंगू से पीड़ित मरीज़ न रहता हो ।

राजा जी आपको याद तो होगा कि तीस चालीस साल पहले शाम तक दिल्ली की सड़कों पर रहो और फिर रुमाल से अपना मुँह पोंछो तो वह काला हो जाता था । प्रदूषण की इस इंतहा को फ़्लाईओवरो व मेट्रो के जाल से और ज़हर उगलने वाली ब्लू लाइन बसों को सड़कों से हटा कर क़ाबू में किया गया था । अब एसा कुछ क्यों नहीं हो सकता ? अभी और कितने हालात बिगड़ेंगे , जब आपकी नींद खुलेगी ? दुनिया भर के तमाम हेल्थ सर्वे कह रहे हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने का मतलब दस साल और उत्तरी भारत में निवास का मतलब अपनी उम्र सात साल कम करना है । हुज़ूर क्या यह आँकड़ा काफ़ी नहीं है , अब क्या इससे भी बदतर हालात का इंतज़ार है ? मुआफ़ कीजिये जनाब मैं जानता हूँ कि आप कुछ नहीं करेंगे । आपको पता है कि यह चार दिन की बात है , मौसम बदलेगा और हम लोग सबकुछ भूल जाएँगे । खुदा ख़ैर करे यदि हालात दोबारा बिगड़े तो आप फिर हमारी ही ख़ामियाँ गिनाने लगेंगे । हमने ये किया , हमने वो किया । अपने पाप आपको दिखते ही कहाँ हैं राजा जी ।

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