मुक्तेश्वर मंदिर

रवि अरोड़ा

हाल ही में जब मुक्तेश्वर गया तो पौराणिक मुक्तेश्वर मंदिर भी जाना हुआ । काठगोदाम से 75 किलोमीटर दूर साढ़े सात हज़ार फ़ुट की ऊँचाई पर बने इस मंदिर को दसवीं सदी में क़त्यूरी राजाओं ने एक ही रात में बनवाया था । मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव ने तपस्या की थी और और यही वजह है कि इस मंदिर में शिवलिंग विराजमान हैं । शिव से जुड़ी प्रसिद्ध हिमालय की नंदा देवी, पंचचूली और त्रिशूल चोटियों के निकट बने इस मंदिर में हालाँकि शिवलिंग के इर्दगिर्द विष्णु, ब्रह्मा, पार्वती, हनुमान, गणेश और नंदी की भी मूर्तियाँ हैं मगर फिर भी यह शिव का ही मंदिर माना जाता है और दुनिया भर में शिव के प्रमुख 18 मंदिरों में इसकी गिनती होती है । पहाड़ की चोटी पर बने इस मंदिर की तुलना भक्त लोग कैलाश पर्वत से भी करते हैं । हालाँकि यहाँ आसपास अनेक अन्य मंदिर भी अब बन गए हैं और यहाँ आने वाले श्रद्धालु वहाँ भी शीश नवाते हैं मगर अधिकांश तो यहाँ मुक्ति के ईश्वर यानि शिव को खोजते हुए ही आते हैं और इसलिए ही इस क्षेत्र का नाम मुक्तेश्वर पड़ा । कहा तो यह भी जाता है कि पांडव अपने अंतिम दिनो में यहीं आये थे और यहाँ एक ग़ुफा में उन्हें एक दिव्य ज्योति दिखाई दी और उस ज्योति के पीछे चलते हुए ही वे बर्फ़ीले पहाड़ों में कहीं समा गए । चूँकि उनकी मुक्ति यहीं हुई शायद इसलिए भी इस जगह का नाम मुक्तेश्वर पड़ा । वैसे कहा तो यह भी जाता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं पांडवों ने ही अपने बारह वर्ष के अज्ञातवास में की थी।

अब आप पूछ सकते हैं कि मैं इस मंदिर का गुणगान क्यों कर रहा हूँ और आज इस मंदिर की कथा लेकर क्यों बैठ गया ? तो चलिये असली मुद्दे पर ही आ जाता हूँ । दरअसल सौ सीढ़ियाँ चढ़ कर जब मुख्य मंदिर पहुँचे तो वहीं एक गुफानुमा कुटिया में एक बेहद बुज़ुर्ग सन्यासी एक आरामकुर्सी पर बैठे नज़र आये । एक अधेड़ उम्र की महिला ज़मीन पर बैठ कर उस सन्यासी के पाँव दबा रही थी और बग़ल में खड़े एक अन्य अधेड़ व्यक्ति कुटिया में आये लोगों को प्रसाद बाँट रहे थे । कुछ घर और कुछ मंदिर नुमा इस कुटिया में एक सन्यासी की आदमक़द प्रतिमा भी बैठी हुई मुद्रा में नज़र आई । मैंने जिज्ञासा वश उस व्यक्ति से बातचीत शुरू कर दी । पता चला कि जिन सन्यासी की प्रतिमा वहाँ है उन्होंने ही मुक्तेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था और आरामकुर्सी पर अधजगे और अधसोये से जो सन्यासी बैठे हैं वे उन्ही प्रतिमा वाले सन्यासी के शिष्य हैं । प्रसाद बाँट रहे उसी व्यक्ति ने बताया कि वह स्वयं आरामकुर्सी वाले सन्यासी का शिष्य है और पाँव दबा रही महिला उसकी पत्नी है । उसने बताया कि उसका नाम उत्कर्ष बिश्ट है और वह अहमदाबाद का रहने वाला है तथा हर दो-तीन महीने बाद यहाँ अपने गुरु की सेवा के लिए आ जाता है । बक़ौल उसके सन्यासी के अनेक अन्य शिष्य भी विभिन्न शहरों में रहते हैं और वे भी गुरु जी की सेवा के लिए आते रहते हैं ।

मंदिर कि सीढ़ियाँ उतर कर मैं उन दुकानदारों से गपशप करने लगा जो वहाँ प्रसाद, चाय, नींबू पानी और पकोड़ों आदि के स्टाल लगाये बैठे थे । आस पास के गाँवों के निवासी उन लोगों से जब ग़ुफ़ा और उस सन्यासी के बाबत बातचीत की तो उन्होंने कुछ और ही कहानी बताई । बक़ौल उनके यह मंदिर तो सैकड़ों साल पुराना है मगर ये कुटिया वाले इसे अपनी मल्कीयत समझते हैं । सारा चढ़ावा भी उन्हें ही जाता है । उन्होंने बताया कि यहाँ पास में जो विशाल परिसर वाला इंडियन वैटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट है , इस मंदिर की देखभाल पहले उसी के लोग करते थे । सन 1883 में अंग्रेज़ों द्वारा बनाये गए इस इंस्टीट्यूट में आज़ादी के बाद बंगाल के अधिकारियों का बोलबाला था । चूँकि स्थानीय पंडित उनकी भाषा और परम्परायें नहीं जानते थे इसलिए वही लोग उन प्रतिमा वाले सन्यासी को बंगाल से लाये थे । वे बंगाल में ही कहीं किसी मंदिर में पुरोहित थे । स्थानीय लोग उन्हें लाल बाबा कहने लगे । बाबा के साथ एक सहयोगी भी था जो अब यहाँ का कर्ताधर्ता है और अब वह लाल बाबा कहलाता है । आराम कुर्सी पर बैठ कर स्त्री से पैर दबवा रहा सन्यासी वही सहयोगी है । दुकानदारों की मानें तो इस सन्यासी का कोई परिजन नहीं है और अब उसकी गद्दी पर क़ब्ज़े को लेकर अनेक लोग लाईन में लगे हुए हैं । अपनी पत्नी से सन्यासी के पैर दबवा रहा व्यक्ति भी एसा ही एक कैंडीडेट है । दुकान वाले बताते हैं इस कुटिया से ही वह ग़ुफ़ा शुरू होती है जिसमें पांडवों को दिव्य ज्योति दिखी थी और उसी के पीछे चलते हुए पांडव हिमालय में कहीं समा गये थे । कुटिया वाला सन्यासी पांडवों वाली ग़ुफा के पास केवल उन्हें ही जाने देता है जो उसके शिष्य हैं और नियमित रूप से उसकी सेवा अथवा ज़रूरतों को पूरा करते हैं । मुक्तेश्वर से लौट कर अब मैं हिसाब लगा रहा हूँ कि हमारे सभी धार्मिक स्थानों का हाल एक ही जैसा क्यों है ? सब जगह पैसा, ताक़त और वर्चस्व की ही कहानी क्यों दिखती है ? हमारी श्रद्धा से किसी की दाल रोटी चले यहाँ तक तो ठीक है मगर वह हमारे भावनात्मक, शारीरिक, आर्थिक और मानसिक शोषण का भी कारण बने, यह कहाँ तक उचित है ?

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