देश बदल रहा है

रवि अरोड़ा

वैसे पक्का पता नहीं कि देश बदल रहा है या यह मेरे मन का वहम है मगर इतना तो तय है इसे बदलने का काम तेज़ी से हो रहा है । अब यह भी मुझे नहीं पता कि बदला हुआ देश भविष्य में जा रहा है अथवा अतीत में, नई ऊँचाइयों पर अथवा गर्त में मगर यह तो निश्चित है कि कहीं जा ज़रूर रहा है । अब देखिए न, आदमी छोटे हो रहे हैं और मूर्तियाँ बड़ी । अब मूर्तियों में भी प्रतियोगिता है । तेरी बनाई मूर्ति मेरी मूर्ति से बड़ी कैसे ? साउथ में चुनावी बेला पर नेताओं के कटआउट के साईज की जंग अब पूरे मुल्क तक आ पहुँची है । मोदी जी का बनवाया सरदार पटेल का स्टेचू दुनिया में सबसे ऊँचे स्टेचू का ख़िताब हफ़्ता भर भी नहीं संभाल पाया और अब योगी जी अयोध्या में भगवान राम का उससे से भी बड़ा स्टेचू बनवाने जा रहे हैं । दुनिया भर में ऊँची इमारतें , पुल और सड़कें बनाने की प्रतियोगिता है मगर हम राजा महाराजाओं की तरह मूर्तियाँ बनवा रहे हैं । अब ये मूर्तियाँ और कुछ काम करेंगीं अथवा नहीं मगर आदमी को उसके छोटे होने का अहसास ज़रूर कराएँगीं । यही वजह है कि स्टेचुओं की मदद के लिए आदमी को और छोटा करने का प्रयास भी अब और अधिक तेज़ हो चला है ।

अपना देश कभी सेकुलर हुआ करता था मगर राम की क़समें खाने वालों ने उसे अधिक समय तक धर्मनिरपेक्ष रहने नहीं दिया । कांग्रेस भी जैसे सोते से जागी और उसे भी अहसास हो गया कि मुल्क की 79 फ़ीसदी हिंदू आबादी को गुदगुदाना ज़रूरी है । नतीजा पार्टी के जनेयुधारी अध्यक्ष राहुल गांधी मंदिरों में ताली बजा बजा कर कीर्तन कर रहे हैं और सोमनाथ, कैलाश मानसरोवर और महाकाल से लेकर हर गली मोहल्ले के मंदिरों की यात्राओं पर हैं I डरी भाजपा फिर राम मंदिर की शरण में जा रही है और उसका पूरा कुनबा मंदिर-मंदिर की तोता रटंत पर है । दूसरी ओर ख़ुद को सेकुलर कहने वाले सभी दल कंधे पर हरा गमछा लाद कर मदीने की राह पर निकल पड़े हैं । वाह सचमुच देश बदल रहा है ।

कई बार सोचता हूँ कि सचमुच देश बदल रहा है कि यह मेरे मन का वहम है । क्योंकि देश बदला होता तो हालात भी कुछ अवश्य बदले होते मगर एसा तो नहीं हो रहा । हमारी परिस्थितियाँ तो वही की वही हैं । आज भी दुनिया के सबसे ग़रीब हमारे नागरिक ही हैं । दुनिया का हर चौथा ग़रीब भारतीय है । भुखमरी की शिकार दुनिया की आधी आबादी हमारी है । हमारे चौदह करोड़ लोग रोज़गार के लिए मारे मारे घूम रहे हैं । मगर इसका तो ज़िक्र भी नहीं हो रहा । हो सकता है कि बन रही मूर्तियाँ कुछ बड़ा करने की हमें कुछ प्रेरणा दे रही हों मगर एसा होता हुआ तो नहीं दिखता । हो तो विपरीत ही रहा है । मूर्तियों से सजे देश के दस लाख से अधिक मंदिर हैं और इनसे कोई प्रेरणा लेते तो हम नहीं दिखते । हाँ इन मंदिरों का पेट ज़रूर बाहर आ गया । सरकार के विकास बजट से ज़्यादा धन साल भर में ये मंदिर चढ़ावे में इकट्ठा कर लेते है । एक लाख करोड़ रुपये की संपदा वाले भी कई मंदिर हमारे यहाँ हैं । भगवान की मूर्तियों की यह रईसी हमारे ग़रीब होने का उपहास ही शायद उड़ाती हैं। मगर हमें शायद अभी थोड़े और उपहास की ज़रूरत है तभी तो हमारे कर्णधारों ने कुछ और मूर्तियाँ बनवाने का निर्णय लिया है । तो आइये इन मूर्तियों के समक्ष खड़े होकर अपने कुछ और बौने होने का अहसास करें और चिल्ला कर कहें कि देश बदल रहा है ।

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