डर का बाज़ार

रवि अरोड़ा
मेरा एक मुस्लिम दोस्त आज मुझसे नाराज़ हो गया । दरअसल प्रदेश में धार्मिक स्थलों से लाउड स्पीकर उतारे जाने की मैं उनके सामने हिमायत कर बैठा और यही बात उन्हें नागवार गुजरी । उनका कहना था कि प्रदेश की योगी सरकार जानबूझ पर मुस्लिमों को परेशान कर रही है और बदनीयती से रमज़ान के महीने में ही इस फैसले को लागू कर दिया गया जबकि यह काम चार दिन बाद भी हो सकता था । उन्हें इस बात का भी अंदेशा था कि सरकार और प्रशासन इस मामले में बराबरी का सलूक नहीं करेंगे और जानबूझ कर केवल मस्जिदों से ही लाउड स्पीकर उतारे जाएंगे । अपने इस मित्र से हुई पूरी बहस तो आपको बताने की कोई तुक नहीं मगर यह तो विचारणीय है कि अच्छे और जनोपयोगी फैसलों पर भी भला कभी कभी शंकाओं के बादल क्यों आ जाते हैं ?

मैं अपने तईं मित्र को बताने का प्रयास कर रहा था कि रात दस बजे से सुबह छह बजे तक लाउड स्पीकर न बजाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट सन 2005 में ही दे चुका है तथा उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के हाई कोर्ट भी इस आशय के आदेश पारित कर चुके हैं तथा योगी सरकार केवल इन्हीं आदेशों का पालन कर रही है । मैंने उन्हें वे तमाम रपटें भी दिखाईं जिसके अनुरूप मक्का मदीना के मुल्क सऊदी अरब , मुस्लिमों की सबसे बड़ी आबादी वाले इंडोनेशिया और तुर्की, मोरक्को जैसे देशों में भी मस्जिदों पर लाउड स्पीकर लगाने पर प्रतिबंध है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े देशों में भी धार्मिक स्थलों पर ये लाउड स्पीकर बैन हैं । यही नहीं सिंगापुर की उस सुलतान मस्जिद में भी अब लाउड स्पीकर पर अजान नहीं होती जहां साल 1936 में इसका इस्तेमाल सबसे पहले हुआ था । मेरा तर्क यह भी था कि लाउड स्पीकर को किसी भी धर्म का हिस्सा कैसे माना जा सकता है जबकि इसके अविष्कार को अभी सौ साल भी पूरे नहीं हुए । हजारों सालों से जब हम बिना लाउड स्पीकर के अपने पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान और इबादत करते आ रहे हैं तो अब क्यों नहीं कर सकते ? लाउड स्पीकर का यह दुरुपयोग भी किससे छुपा है कि उन इलाकों में भी बहुत ऊंची आवाज वाले लाउड स्पीकर पर अजान और जगराते आदि होते हैं जहां उस धर्म के मानने वालों की आबादी न के बराबर होती है । रमजान के महीने में रात को तीन बजे से थोड़ी थोड़ी देर में लाउड स्पीकर पर बताना शुरू हो जाता है कि सहरी खत्म होने में अब कितना वक्त बचा है और अब कितना । भाई अब पुराना ज़माना नहीं है और सबके पास घड़ी है मगर कौन समझाए । जिस जागरण में दस लोग भी नहीं होते , वो भी सारी रात लाउड स्पीकर बजा कर दूसरों की नींद हराम करते हैं । धार्मिक स्थलों से लाउड स्पीकर हटाए जाने के बाबत मेरा यह भी कहना था कि इससे यदि परेशानी होगी तो हिंदुओं को अधिक होगी क्योंकि प्रदेश में मस्जिदों से कई गुना अधिक तो मंदिर हैं ।

उधर, मित्र के तर्क बेशक ढीले ढाले थे मगर उसकी कुछ बातें मुझे निरुत्तर कर रही थीं । उसका कहना था कि क्या इस बात पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि अदालत के इतने पुराने आदेश के पालन के लिए यही वक्त क्यों चुना गया, जब देश भर में साम्प्रदायिक तनाव का माहौल है और हनुमान जयंती पर दिल्ली समेत अनेक राज्यों में हिंसा हुई है ? क्या यह आदेश ईद के बाद नहीं दिया जा सकता था ? महाराष्ट्र में राज ठाकरे के मस्जिदों से लाउड स्पीकर हटाने के अल्टीमेटम से उसे मिली प्रसिद्धि के बाद ही क्यों उत्तर प्रदेश सरकार को कोर्ट का यह फैसला याद आया ? मुस्लिमों के खिलाफ बुलडोजर के गैरजरूरी इस्तेमाल, उनके खिलाफ छोटे से छोटे आपराधिक मामले में की गई बड़ी कार्रवाई के भी अनेक उदाहरण उसने गिनाए । उसका यह भी मानना था कि धार्मिक स्थलों से लाउड स्पीकर उतारे जाने में भी पक्षपात किया जाएगा और जानबूझ कर मस्जिदों के साथ ही ऐसा होगा । मित्र की बातों के उत्तर में मैंने उसके समक्ष आंकड़े भी रखे कि प्रदेश भर में बिना किसी पक्षपात के लाउड स्पीकर हटाए जा रहे हैं और कहीं से भी अभी तक भेदभाव की कोई खबर नहीं है । अनेक प्रभावी तर्क देने के बाद भी जब मैं मित्र को रूठने से न रोक सका तो अब बैठा यह मनन कर रहा हूं कि क्या सारी गलती मेरे इस मित्र की ही है अथवा सत्ता पर काबिज उन नेताओं की भी है जो कदम कदम पर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक के मनों में शंका पैदा करने से बाज नहीं आते और अपने हर फैसले से यही साबित करने की कोशिश करते रहते हैं कि मुस्लिम इस देश में दोयम दर्जे का नागरिक हैं। उनके चेले चांटे सुबह शाम सांप्रदायिकता का ज़हर हवाओं में घोलते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ता । जाहिर है यह माहौल मनों में डर और शंकाएं तो पैदा करेगा ही । अब डरे हुए आदमी को कोई तर्कों से सहमत कर पाए भी तो कैसे ?

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