खाँचों में बँटी संवेदना

रवि अरोड़ा
केरल के मलप्पुरम जिले में पटाखों से भरा अनानास खिला कर की गई एक गर्भवती हथिनी की निर्मम हत्या से पूरे देश में उबाल है । ग़म और ग़ुस्से से सोशल मीडिया के तमाम माध्यम भरे पड़े हैं । इस हत्या ने राज्य और केंद्र सरकार को भी आवेश में ला दिया है । केंद्रीय वन मंत्री प्रकाश जावडेकर , पशु प्रेमी और सत्ता पक्ष की सांसद मेनका गांधी और केरल के मुख्यमंत्री विजयन समेत तमाम नेताओं के ग़ुस्से भरे बयान आये हैं । इस हथिनी की मौत है ही इतनी दर्दनाक कि कठोर हृदय व्यक्ति का भी दिल भर आएगा । मुझे भी यह हत्या बेहद नागवार गुज़री । वैसे यह देख कर थोड़ा संतोष भी हुआ कि हम लोगों की संवेदनाएँ अभी मरी नहीं हैं और किसी मासूम का दर्द अब भी हमसे देखा नहीं जाता । हालाँकि हैरानी भी हुई कि एक जानवर की मौत पर जो आँसू गिरे वे इंसान की मौत पर क्यों पलकों पर नहीं आते ? लॉकडाउन की वजह से जो सैंकड़ों लोग मरे उनके लिए भी यदि लोग बाग़ एसे आँसू बहाते तो शायद थोड़ी राहत महसूस होती । हथिनी की मौत पर आवेश में आये मंत्री-मुख्यमंत्री इंसानों की मौत पर यदि कोई बयान देते तो शायद इनके इस दुःख पर भी एतबार होता ।
मानवीय संवेदनाओं की भी ग़ज़ब कहानी है । उसकी राह में अनेक तरह के फ़िल्टर लगे हुए हैं । जानवर की मौत पर बेशक हमारी संवेदना जागती है मगर इंसान की मौत को राजनीति के चश्मे से देखती है । ग़रीब मज़दूरों के सड़कों और रेल की पटरियों पर भूखे-प्यासे मरने पर यदि हमारी संवेदना उपस्थित हुई तो उससे फ़लाँ पार्टी का नुक़सान होगा या फ़लाँ का फ़ायदा होगा अतः हमारी संवेदना कहीं छुप जाती है । हथिनी के हत्यारे पर डेड लाख रुपये का इनाम हम रख देते हैं मगर इंसानों की मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार है , इस पर चर्चा से भी बचते हैं । हथिनी की मौत पर गमगींन हुए लोगों में उन लोगों की गिनती भी कम नहीं है जो दावा करते हैं कि लाक़डाउन में क़हीं कोई आदमी नहीं मरा और घर घर घी के दीये आजकल जल रहे हैं । जीवन में कदम कदम पर हमारी संवेदना खाँचों में बँट कर हाज़िर होती है । अब चूँकि इस हथिनी की मृत्यु पर उपजी संवेदना के मार्ग में कोई रुकावट नहीं है अतः इस पर हर कोई निर्बाध दुःखी हो रहा है । अजब सूरत है कि संवेदना एक ही परिस्थिति के भिन्न भिन्न रूपों में भी हो सकती है । मरने वाला अपने धर्म का है तो संवेदना जगेगी और यदि दूसरे धर्म का है तो यह मौत जुगुत्सा जगाएगी । मरने वाले की जाति, लिंग और रंग भी तय करने लगते हैं कि संवेदना की अभी ज़रूरत है अथवा उसे आराम करने दें। अमेरिका के दंगे या यूँ कहें दुनिया के तमाम दंगे इसका उदाहरण हैं । हिंदू-सिख माँसाहारी लोगों की संवेदना हलाल मीट पर तो सहज जग जाएगी मगर यदि मीट झटका है तो संवेदना सुस्ता सकती है । ईद पर जानवरों की क़ुरबानी पर हमारी संवेदना होश में आ जाएगी और हमें चहुँओर ख़ून ही ख़ून दिखने लगेगा मगर साल के बाक़ी 364 हम स्वयं मीट शाप पर जाकर तय कर सकते हैं कि बकरे का फ़लाँ हिस्सा देना अथवा फ़लाँ मत देना । मच्छर , मक्खी, कीड़े-मक़ौड़े और चूहे आदि तो ख़ैर हमारी संवेदना के दायरे में आते ही नहीं । दोनो दूध देती हैं मगर गाय और भैंस भी हमारी संवेदनाओं का अलग अलग कोना पकड़े बैठी हैं ।
कई बार तो लगता है कि हम सबके भीतर एक मेनका गांधी है जो जानवर की मौत पर तो दुःखी होती है मगर इंसान के जीने मरने से उसे कोई सरोकार नहीं है । पिछले दो महीने से एसी हज़ारों घटनाएँ सामने आई हैं जो सौ सौ हथिनीयों की मौतों के बराबर हैं । मुल्क में जितने लोग हैं , उतने ही तरह के दुःख हैं । करोड़ों लोगों का जीवन अब वैसा ख़ुशहाल नहीं रहेगा जैसा कोरोना काल से पहले था । मगर खाँचों में बँटी हमारी संवेदना मन मुताबिक़ घटनाओं की तलाश में भटकती रहती है । यक़ीनन इस गर्भवती हथिनी ने हमें यह अवसर प्रदान किया है जिसमें हम ख़ुद को बता सकें कि हमारे सीने में भी दिल है । इस हत्या पर ट्वीट करके हम अपने लोगों को भी अब जता सकते हैं कि जनाब हम भी सहृदय इंसान हैं।
 
 

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