हैप्पी एंड

रवि अरोड़ा
लीजिए तमाशा खत्म हुआ । नोएडा के ट्विन टॉवर जमींदोज हो गए । खूब तालियां बजीं। वीडियो बने, सेल्फियाँ ली गईं। कुछ ने आमने सामने से तो कुछ ने अपने घरों की छतों पर चढ़ कर नज़ारा देखा । कुछ कुछ वैसा ही जैसे धू धू कर रावण जलता देखते हैं। दोनो तमाशों में विध्वंस है। दोनो में विस्फोटक है, उत्तेजना व आशंकाएं हैं। बच्चे इस बार भी पिता के कंधों पर चढ़े थे और पिता इस बार भी जोश में चिल्लाए थे- वो देख वो देख । सब खुश थे । एथॉरिटी वाले सबसे ज्यादा। बनवाने में मुंह भरा और अब गिरवाने में भी शाबाशी मिली । सरकार खुश कि उसे कहने का मौका मिला, देखो हम कितने ईमानदार हैं , भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस है हमारी । जज साहब खुश हैं कि देश में अब तक की सबसे बड़ी इमारत गिरवाने पर इतिहास में नाम हो जायेगा उनका । जिस कंपनी ने बीस करोड़ में दोनो टॉवर गिराए उसे तो डबल फायदा हुआ । मुनाफे के साथ साथ आगे और काम मिलने का अवसर मिलेगा । अवैध इमारतों की कोई कमी है क्या देश में ? बिल्डर भी शायद खुश हो कि चलो इसी बहाने बैंकों के पैसे दबा लेगा । बैंक वालों का भी क्या, उनके कौन से बाप का पैसा था । लाखों करोड़ डूब चुके हैं तो दो चार हज़ार करोड़ और सही।

आपका तो पता नहीं मगर मुझे पक्का विश्वास है कि हमारा मुल्क तमाशबीनों का मुल्क है। यूं भी जीवन बोरियत से भरा होता है हम लोगों का । उत्तेजना के लिए ढूंढते हैं हम तमाशे। नगर निगम गड्ढा खोद रहा हो अथवा कहीं कोई बुलडोजर चल रहा हो, सौ पचास लोग तो यूं ही जुट जाते हैं। ये तो फिर भी बहुत बड़ा इवेंट था। दशकों बाद होता है ऐसा इवेंट । कसम से विध्वंस में जो आनंद हमें मिलता है, वह सृजन में कतई नहीं मिलता। यह ट्विन टॉवर जब बन रहे थे तब हमें दिखे ही नहीं और अब उसकी तस्वीरें खींच खींच कर हम उसके साक्षी होने की गवाही दे रहे हैं। वैसे ही जैसे ऐतिहासिक इमारतों पर अपना नाम कुरेद कर देते हैं। किसी अजूबे से कम नहीं है नैतिकता हमारी। पैसे के पीछे हम सब दौड़ रहे हैं और रूपये कमाने को हर उल्टा सीधा काम करने को तैयार हैं मगर साथ ही साथ हमें पैसे वालों से नफरत भी खूब है। जो जितना फक्कड़ है, उसकी नफ़रत उतनी ही बड़ी है। शायद यही कारण है कि गरीब आदमी को इस विध्वंस में सबसे अधिक आनंद आया । उसके कलेजे को सबसे ज्यादा ठंड पड़ी।

पता नहीं क्यों मगर मुझे इमारतों से अधिक यह दिमागों का विध्वंस लगता है। बिल्डर को दंडित करने के इससे भी अच्छे तरीके हो सकते थे । बेशक ऐसी अवैध इमारतें खड़ी नहीं होने देने चाहिए मगर जब हो गईं तो उसे जब्त करके उसका बेहतर और सार्वजनिक इस्तेमाल भी हो सकता था । क्या ही अच्छा होता कि बारह सौ करोड़ रूपए की इन इमारतों में रैन बसेरे बना दिए जाते । नॉएडा में यूं भी हजारों लोग खुले आसमान के नीचे रोज़ सोते हैं। इन इमारतों से जन जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा जब नहीं था तब क्या इन्हें गिराने के अतिरिक्त अन्य उपायों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए था ? बेशक नॉएडा की यह इमारतें भ्रष्टाचार का प्रतीक थीं और इन्हें गिरा कर हम रावण दहन जैसा आनंद उठा लें मगर मजा तो तब है ना कि जब कोई नया रावण सिर न उठाए । अगले साल जब फिर रावण का नया और पुराने से भी बड़ा पुतला फूंकना पड़ा तो फिर इस तमाशे का क्या अर्थ रह गया ?चलिए फूंक दिया तो फूंक दिया रावण का पुतला मगर उन असली रावणों यानि अफसरों और नेताओं का क्या जिन्होंने नौ साल सिर पर खड़े होकर यह रावण खड़ा करवाया और अब इसके दहन पर एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं। क्या इसे ही कहेंगे हैप्पी एंड ?

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