सारे जमीन पर

रवि अरोड़ा
सबसे पहले तो मैं स्वीकार करना चाहता हूं कि ‘ सारे जमीन पर ‘ शीर्षक मेरे अपने दिमाग की उपज नहीं है। मैंने तो इसे बस सोशल मीडिया की एक पोस्ट से उधार लिया है। दरअसल अडानी ग्रुप की सभी कंपनियों के शेयर रोजाना औंधे मुंह नीचे गिर रहे हैं और इस विषय पर कुछ लिखने के लिए मैं शीर्षक सोच रहा था, तभी मेरी निगाह इस शीर्षक पर पड़ी। वैसे अडानी ग्रुप के शेयरों की जो हालत आजकल हो रही है उसके बाबत तो शायद आप भी मानेंगे कि इस विषय पर इससे बेहतर कोई और शीर्षक हो नहीं सकता । हालांकि यहां यह सवाल भी खड़ा होता है कि जमीन पर अडानी ग्रुप और उसके शेयर ही आए हैं अथवा उसके साथ कुछ और भी जमीन पर आया है ? मेरा मतलब है कि क्या अडानी के पीछे खड़ी मोदी सरकार और उसके बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा भी कुछ नीचे आई है ? यदि नहीं आई है तो इस विषय पर भाजपा में इतना सन्नाटा क्यों है और उसके आला नेताओं की बोलती क्यों बंद है ? यदि आई है तो फिर एक आध विपक्षी दल की जुबानी जमा खर्ची के अतिरिक्त देश में कहीं कुछ और होता दिखाई क्यों नहीं दे रहा ?
पहले दावा किया जा रहा था कि अमेरिकी रिसर्च कंपनी हिंडनबर्ग के सारे आरोप फर्जी हैं और इनसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर एक महीने में ही अडानी ग्रुप का कैपिटलाइजेशन सत्तर फीसदी नीचे आ गया और कंपनी के आठ लाख करोड़ रुपए डूब गए तो पूरी दुनिया को पता चल गया कि सारे आरोप सही थे । ग्रुप के अध्यक्ष गौतम अडानी जो दुनिया के तीसरे सबसे बडे़ रईस हो गए थे, इस रिपोर्ट के बाद अब 29वें नंबर पर हैं। अपने चरम पर कंपनी का मार्केट कैप 25 लाख करोड़ तक पहुंच गया था और अब यह मात्र साढ़े सात लाख करोड़ के आसपास खड़ा है। यह अभी और कितना कम होगा, कोई नहीं जानता । क्या अब भी सरकार कहेगी उसने अपना काम ईमानदारी से किया है और अडानी ग्रुप के फर्जीवाड़े से उसका कोई लेना देना नहीं है ? यदि ऐसा नहीं था तो कैसे निगरानी के लिए बने तमाम सरकारी विभागों के होते हुए भी ग्रुप के शेयरों की वैल्यू फर्जी तरह से बढ़ा चढ़ा कर दिखाई जा रही थी ? कैसे बंदरगाह, खदानें, एयरपोर्ट और ट्रांसमिशन जैसे सारे क्षेत्र एक एक कर अडानी ग्रुप को सौंपे जा रहे थे ? कैसे सवा दो लाख करोड़ रुपए उसे यूं ही सरकारी बैंकों से कर्ज के रूप में दे दिए गए और अब किसकी शय पर उसे और कर्ज देने के दावे किए जा रहे हैं ?
इसमें कोई दो राय नहीं कि आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार ने हमें अपने चंगुल में ले रखा है और इस मामले में हर नई सरकार पुरानी सरकार से दो कदम आगे ही खड़ी मिलती है। पहले कहा जाता था कि मनमोहन सिंह नीत कांग्रेस की सरकार में सर्वाधिक भ्रष्टाचार हुआ । इसमें कोई दो राय भी नहीं है कि ऐसा हुआ भी था मगर इस सत्य के साथ यह तथ्य भी तो नत्थी है कि मनमोहन शासन में भ्रष्टाचारी नेता जेल भी खूब भेजे गए थे । जेल जाने वालों में सरकार के मंत्री भी थे मगर तो अब स्थितियां बिलकुल उलट हैं। अब भ्रष्टाचार के आरोप में केवल विपक्षी दल के नेताओं को ही जेल भेजा जाता है और आरोपों की जद में आए अपने नेताओं की जांच तक नहीं होती। देश को अरबों रुपयों का चूना लगा कर दो दर्जन से अधिक बड़े लोग विदेश भाग गए और उन्हें आराम से ऐसा करने दिया गया । बेशक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी भी देश के सबसे अधिक चहेते नेता हैं मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कभी न कभी तो हर चीज की एक्सपायरी डेट होती ही है। नेताओं और राजनीतिक दलों की भी होती है। इस लिहाज से तो मोदी जी की प्रसिद्धि का भी कभी अवसान होगा । साल 2024 के आम चुनावों में नहीं तो 2029 अथवा 2034 में सही । तब क्या ये सारे हथकंडे उन्हीं पर नहीं आजमाए जाएंगे जिनकी शुरुआत उन्होंने की है ? क्या तब इन सवालों को नहीं उछाला जायेगा कि अडानी के प्रति मोदी जी इतने मेहरबान क्यों थे ? पता नहीं आप क्या सोचते हैं मगर मुझे तो यही लगता है कि इतिहास बेहद निर्दयी होता है। वह किसी का भी लिहाज नहीं करता । जाहिर है कि आज के लोगो का भी लिहाज़ नहीं करेगा । तब क्या क्या तमाशे होंगे ?

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