सब दिन होत न एक समान

रवि अरोड़ा
श्रीलंका के हालात डराते हैं। प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन पर कब्ज़ा कर उत्पात मचाएं और प्रधान मंत्री के घर में आग लगा दें, किसी मुल्क की बर्बादी की इससे अधिक बदनुमा तस्वीर और भला क्या होगी? चलिए श्रीलंका में जो हो रहा है सो हो रहा है मगर हमारे यहां कुछ लोग क्यों लोटपोट हो रहे हैं और भविष्यवाणी कर रहे हैं कि भारत के साथ भी ऐसा ही होने जा रहा है ? बेशक भारत में भी ठंडी बयार नहीं चल रही है और अनेक तरह के संकटों से हमारा मुल्क भी जूझ रहा है मगर फ़िर भी भारत भारत है, यहां किसी भी सूरत श्रीलंका जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती । मगर कौए तो कोए हैं, वे तो पशु की मृत्यु की ही कामना करेंगे। इस पर यदि आप किसी पंजाबी बुजुर्ग से पूछेंगे तो वह यही कहेगा कि कांवां दे आखे ढौर नईयो मरदे।

बेशक आज श्रीलंका में राजनीतिक संकट भी व्याप्त हो गया है मगर वहां का मूल संकट आर्थिक ही है। विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने से भी देश तबाह हो सकते हैं, श्रीलंका दुनिया में इसकी इकलौती मिसाल नहीं है। लीडर की सनक के चलते विदेशों से खाद आयात बंद करने के केवल एक फैसले ने ही श्रीलंका में आग लगा दी । बेशक श्रीलंका में भी अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न और राष्ट्रवाद का ज्वार ठीक वैसा ही था जैसा भारत में आज नज़र आता है मगर फिर भी श्रीलंका और भारत में बहुत फर्क है। भारत एक बड़ा देश है और हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी ठीक ठाक है और यदि तेल की अंतराष्ट्रीय कीमतों में बहुत अधिक इज़ाफा नहीं हुआ तो इसमें बड़ी गिरावट के आसार भी नहीं हैं। बेशक मोदी सरकार ने नोट बंदी जैसी अनेक बड़ी भूलें कर भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया है मगर फिर भी देश की आर्थिक स्थिति नियंत्रण में है। हालांकि पहले कोरोना और अब रशिया यूक्रेन युद्ध के चलते व्याप्त हुई विश्व व्यापी महंगाई ने भारत की बड़ी आबादी की कमर तोड़ रखी है मगर फिर भी एक देश के तौर पर भारत बहुत अधिक कमजोर नहीं हुआ है। अर्थशास्त्री आजकल दावा कर रहे हैं कि विश्वव्यापी मंदी एक बार फिर सिर पर है मगर 2008 की मंदी की तरह भारत इससे भी सकुशल बाहर आ जायेगा, इसमें भी किसी को संदेह नहीं है। दुनिया जानती है कि एक आत्मनिर्भर देश के तौर पर पिछले तीन दशकों से भारत आगे ही बढ़ रहा है । बेशक नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकारों के कार्यकाल जैसी कुलाचें आज देश नहीं भर रहा है मगर फिर भी उसे किसी बड़ी फिसलन का खतरा नहीं है, यह तमाम अर्थशास्त्री मानते हैं।

वैसे अपनी कोई हैसियत नहीं है कि देश की मोदी सरकार को कोई सलाह दे सकें मगर कहने से रुका भी नहीं जाता कि श्रीलंका ने भारत को कम से कम यह तो सिखा ही दिया है कि क्या क्या नहीं करना है। वोटों की राजनीति में लोकलुभावनी नीतियां किसी देश को कहां तक तबाह कर सकती हैं, श्रीलंका ने खुल कर बता दिया है। बहुसंख्यकों की राजनीति घातक हो सकती है, यह भी निकल कर सामने आया है। राष्ट्रवाद का बुखार स्थाई नहीं होता और कभी न कभी जनता को अपनी मूल जरूरतें याद आ ही जाती हैं। श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे जिस तरह से अपना महल छोड़ कर भागे उससे भी स्पष्ट हुआ है कि जरूरी नहीं कंधे पर बिठाए गए लोग कभी जमीन पर पटके नहीं जायेंगे। वैसे यह मैं नहीं कह रहा मगर सूरदास जी तो सदियों पहले बता गए थे न कि सब दिन होत न एक समान ।

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