शुक्रिया सीमा हैदर

रवि अरोड़ा

प्रिय सीमा हैदर भाभी,
खुश रहो। कृपया भाभी शब्द को अन्यथा मत लेना । तुम गरीब की जोरू हो इस नाते हमारा हक है कि तुम्हें भाभी कहें । खैर, इस पत्र का मकसद यह है कि मैं तुम्हारा दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं । शुक्रिया इसलिए कि तुमने चोरी छुपे पाकिस्तान से भारत आकर हमारे नीरस जीवन में नई ऊर्जा का जो संचार कर दिया है वह अभूतपूर्व व अकल्पनीय है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे पास करने को बातें अब खत्म हो चली थीं और हम लोग उल जलूल बातों से ही अपना दिल बहला रहे थे । तुम आईं तो जैसे बहार ही आई। आखिरकार हमें चिंता करने के लिए कुछ मिल ही गया । कहना जावेद अख्तर का- तुम न होती तो ऐसा होता , तुम न होती तो वैसा होता । सचमुच मैं तो यही सोच सोच कर मरा जा रहा हूं कि इस खुश्क माहौल में यदि तुम न आई होतीं तो हम लोग किस किस नामुराद बातों में मुबतला होते ?

सीमा तुम सोच भी नहीं सकतीं कि तुम्हारे आने से पहले हमारा जीवन किस क़दर नीरस था । सच कहूं तो तुम्हारी आमद ने हमें अपने होने के सही मायने दे दिए हैं । आज हमारे मीडिया, सोशल मीडिया, महफिलों , किटी पार्टियों, चौराहों और जहां भी मौका मिले, वहीं तुम्हारा ही नाम सबकी ज़बान पर है । बात तुम्हारे पक्ष में हो अथवा विपक्ष में मगर हमारी बातों में होती तो केवल और केवल तुम ही हो। कोई तुम्हारी हिम्मत की दाद दे रहा है तो कोई तुम्हारे रूप पर न्यौछावर हुआ जा रहा है। किसी को तुम्हारी अंग्रेजी भा रही है तो कोई तुम्हारी हिंदी पर बलिहारी जा रहा है। बेशक कोई कोई शंकालु यह भी पूछ रहा है कि तुम भारत में कैसे घुस आईं और किसी किसी को तुम पाकिस्तानी जासूस भी लग रही हो । कोई पूछ रहा है कि क्या भारत सरकार तुम्हे वापिस पाकिस्तान भेजेगी तो कोई शर्त लगा रहा है कि तुम्हे अब जेल ही जाना पड़ेगा । कुछ खडूस मुसलमानों को लग रहा है कि उनकी जैसे इज्जत ही लुट गई तो कुछ कट्टर हिंदू मूछों पर ताव दे रहे हैं कि देखा ! हमने भी लव जेहाद कर दिखाया ।

प्रिय सीमा, सच सच बताऊं तो मैं यह सोच सोच कर ही शर्मिंदा हो रहा हूं कि तुम न आई होतीं तो भला हमारा क्या हुआ होता ? क्या पता हम तब भी उस मुए टमाटर का ही विलाप कर रहे होते जो करोड़ों रसोइयों से इन दिनों मुंह फुलाए बैठा है । टमाटर भूलते तो हमें मणिपुर याद आ जाता और हम एक दूसरे से पूछ बैठते कि क्या अब महामानव जी के चरण वहां मंगल ग्रह की यात्रा के बाद ही पड़ेंगे ? यकीनन हर जिले में बन रहे बाढ़ के हालात तो हमें हलकान करते ही और हम फुसफुसाते हुए अपने आप से ही पूछ बैठते कि हमारे टैक्स के पैसे आखिर जा कहां रहे हैं ? बाढ़ को भूलते तो हमें महंगाई याद आती और हम एक दूसरे को बताते कि पिछले साल फलां चीज इतने की थी और फलां सामान इतने का मिलता था । किसी के सपने में चीन आता तो कोई यूसीसी में ही अटका रहता । मन ही मन लोग सवाल करते कि कैसे बावले से धर्मगुरू लोगों को पगलैट किए दे रहे हैं ? फिर खुद को ही जवाब देते कि जाहिल मुरीदों को छिछोरे पीर ही तो मिलते हैं । यही नहीं किसी को कुछ याद आता तो किसी को कुछ । मगर शुक्र है कि ऐसा नहीं हुआ । तुम आ गईं और हम बेकार की बातों में सिर खपाई से बच गए । अब हमारे पास बात करने के लिए तुम हो और तुम्हारी चर्चाओं के बल पर ही हम हर समस्या से निजात पा लेंगे। । प्रिय सीमा सच कह रहा हूं। मैं कतई आशिक मिजाज़ नहीं हूं मगर फिर भी तुम्हे कहने का मन हो रहा है- तुम आ गए हो, नूर आ गया है। नहीं तो चरागों से लौ जा रही थी। शुक्रिया सीमा हैदर, शुक्रिया।

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