शऊर सीखना अभी बाकी है

रवि अरोड़ा
यह सोच कर ही बहुत अच्छा लग रहा है कि इस बार स्वतंत्रता दिवस पर देश के करोड़ों घरों पर तिरंगा लहराएगा। चंद दिनों बाद जब अपनी आंखों से हम यह नज़ारा देखेंगे तो जाहिर है यह किसी सपनीली दुनिया में ही हमें ले जाएगा। मैं अपनी खुशी की बात करूं तो उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि इस बार तिरंगा लिए सबसे अगली कतार में वे लोग खड़े दिखेंगे, इतिहास में जिन्होंने तिरंगे का हमेशा विरोध किया था । तिरंगे को अशुभ मानने वाले ही जब घर घर तिरंगे का आह्वान करें तो भला इससे अधिक सुखद और हो भी क्या सकता है ?

मुझे नहीं मालूम कि भगवा ब्रिगेड का हृदय परिवर्तन हुआ है या फिर यह भी उनका ताली थाली जैसा कोई राजनीतिक एजेंडा है । मुझे तो बस इसी बात की ख़ुशी है कि चलो देर से ही सही मगर उन्होंने तिरंगे को वह सम्मान तो दिया जो पूरा देश आजादी के आंदोलन के समय से ही उसे देता आया है। तमाम असहमतियों के बावजूद जिस तरह से भगवा ब्रिगेड को महात्मा गांधी, बाबा अंबेडकर और सरदार पटेल जैसे देश के असली नायकों को अपनाना पड़ा उसी से अनुमान लगाया जाने लगा था कि देर सवेर तिरंगे के प्रति उनके पूर्वाग्रह भी समाप्त होंगे । बेशक उन्हें यह समझने में एक लंबा वक्त लगा मगर अंततः उन्होंने भी मान ही लिया कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज के समकक्ष अपनी अलग ही ढपली बहुत लम्बे समय तक नहीं बजाई जा सकती। वैसे हो यह भी सकता है कि इस बार उन्होंने अखंड भारत, राष्ट्रवाद, खुद को सच्चा देश भक्त साबित करने और तमाम दुश्वारियों से लोगों का ध्यान हटाने का कोई नया फ्यूजन तैयार किया गया हो मगर जो भी हो, है तो यह लुभावना ही।

अमृत महोत्सव के दौरान 13 से 15 अगस्त तक अपने घर पर तिरंगा फहराते हुए मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मेरे जेहन में कोई ऐसे वैसे सवाल न आएं। हालांकि मुझे यह डर जरूर सता रहा है कि कुछ सवाल बिन बुलाए पास आ ही बैठेंगे । सबसे बड़ा सवाल तो यह ही हो सकता कि तिरंगे के मूल्यों और आदर्शों के सरासर विपरीत रीति नीति और आचरण के इस दौर में इतने बड़े पैमाने पर तिरंगा फहराया जाना कहीं कोई पाखंड तो नहीं होगा ? तिरंगे के एक रंग को रगड़ रगड़ कर फीका करने और दूसरे को लगातार गाढ़ा करने के कुचक्रों के बीच क्या अब असली तिरंगा बचा भी है? सौ साल से भी अधिक समय से तिरंगे को अपनी आन बान शान समझने वाली जनता को ही अब तिंरगे का पाठ पढ़ाने वाले खुल कर बताते क्यों नहीं कि कायदे से तो वे खुद पहली बार तिरंगे को अपना रहे हैं ? एक बात और , क्या यह नए नए मुल्ले के ज्यादा प्याज़ खाने जैसा ही तो कुछ नहीं है ?

चलिए इनकी ये जानें। हम तो बस इस बात का खयाल रखें कि स्वतंत्रता दिवस बीतने के बाद हमें अपने तिंरगे का करना क्या है ? हर साल की तरह क्या इस बार भी उसकी बेकद्री होगी ? वैसे इस बार तो उसकी तादाद भी करोड़ों में होगी, तब क्या क्या नहीं करना होगा हमें ? माना इस बार खुद सरकार तिरंगा लिए खड़ी है और इसलिए राष्ट्रीय ध्वज संहिता की आप परवाह नहीं भी करेंगे तो कोई पूछने नहीं आयेगा मगर हमारा असली देश प्रेम तो 15 अगस्त के बाद झंडे की हालत देख कर ही पता चलेगा ना ? हो सकता है आपको मेरी यह आशंका बेमानी लगे मगर गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, विश्वकर्मा और सरस्वती पूजन के बाद उनकी मूर्तियों के साथ क्या क्या होता है, यह भूल भी तो नहीं सकते । यह तो फिर भी झंडा है। अब यह बताने की जरूरत नहीं कि राष्ट्रीय ध्वज को अपने इष्ट से बड़ा मानने का शऊर हमें सीखना अभी बाकी भी तो है।

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