मेरा जुआ गप – तेरा जुआ थू
मेरा जुआ गप – तेरा जुआ थू
रवि अरोड़ा
पिछले हफ्ते मैं गोवा में था। होटल के निकट ही ओशन 7 नाम का एक कैसिनो दिखा । चूंकि जीवन में कभी कैसिनो नहीं देखा था सो जिज्ञासा वश वहां भी जा पहुंचा । देख कर बड़ी हैरानी हुई कि अरे ये तो मिनी भारत है। मुल्क का ऐसा कोई राज्य नहीं जिसका आदमी वहां दिखाई न दिया हो । हां नहीं थे तो बस वे विदेशी पर्यटक जिन्हें आकर्षित करने के नाम पर गोवा दमन एंड दीव पब्लिक गैंबलिंग एक्ट 1976 के तहत राज्य में खुलेआम जुआ खिलवाया जाता है। पता चला कि उस कैसिनो में रोजाना लगभग आठ करोड़ रुपए का जुआ खेला जाता है। गोवा में कुल दस कैसिनो हैं और एक अनुमान के अनुरूप रोजाना सौ करोड़ रुपए से अधिक का जुआ इन कैसिनो में होता है। गोवा के अतिरिक्त दमन और सिक्किम में भी केंद्र के पब्लिक गैंबलिंग एक्ट 1867 का संविधान के अनुच्छेद 246 जैसा राज्य समर्थित तोड़ निकाल कर ऐसे ही कैसिनो चल रहे हैं। गोवा से लौटा तो पता चला कि केंद्र सरकार ने प्रोमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन एक्ट लागू कर सभी तरह के ऑन लाइन जुए पर रोक लगा दी है। जान कर बेहद खुशी हुई कि चलो देर से ही सही मगर सरकार ने अपने लोगों को जुए की लत से मुक्ति दिलाने को यह महत्वपूर्ण कदम उठा ही लिया । मगर तभी ख्याल आया कि हाल ही में गोवा में जो मैं देख कर आया हूं क्या वह जुआ नहीं है, क्या इस ओर भी केंद्र सरकार की नजर नहीं जानी चाहिए ?
देख कर हैरानी हुई कि गोवा के कैसिनो 24 घंटे खुलते हैं और 24 घंटे ही वहां अपने ग्राहकों को नाच गानों के बीच हर तरह की शराब और वेज नॉन वेज खाने परोसे जाते हैं। देश भर से हजारों लाखों लोग हर साल गोवा में केवल जुआ खेलने ही आते हैं। इन जुआ घरों में सभी टेबलें 24 घंटे फुल रहती हैं और जुआ न खेलने वाले मुझ जैसे किसी आदमी के लिए वहां कुर्सी तो क्या एक छोटा सा स्टूल तक नहीं है। जिस कैसिनो में गया था, पता चला कि वह तो सबसे छोटा है और इससे काफी बड़े बड़े कैसिनो पानी के जहाजों के रूप में समुद्र में चल रहे हैं। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि संविधान के अनुरूप जुआ खिलवाया अथवा न खिलवाना राज्य का विषय है मगर ऐसी कोई तो बात होगी कि अन्य राज्यों ने आजतक इन जुआ घरों से परहेज किया है। तो फिर ऐसा क्या है कि मात्र ये तीन राज्य केंद्रीय कानून को धता बता रहे हैं । क्या इसका एक मात्र कारण यह तो नहीं कि जुए के ये अड्डे कुछ बड़े नेताओं के हैं अथवा उसने उनकी हिस्सेदारी है ?
चलिए जाने दीजिए कैसिनो को । जुए को लेकर यदि सचमुच सरकार गंभीर है तो फिर ये आईपीएल क्या बला है ? कौशल आधारित बनाम भाग्य आधारित जुए की आढ़ लेकर क्यों देश की आंख में धूल झोंकी जा रही है। क्या इसका भी एक मात्र कारण यह तो नहीं कि तमाम राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशन से लेकर बीसीसीआई तक पर चंद बड़े नेताओं और उनके करीबियों का कब्जा है और जो स्पोंसरशिप, ठेकों, फ्रेंचाइजी में हिस्सेदारी, ब्रॉडकास्ट और मीडिया डील के रूप में चांदी कूट रहे हैं। माना कि आईपीएल आज सिर्फ एक खेल लीग नहीं है, बल्कि करेंसी और कारोबार का एक विशाल प्लेटफ़ॉर्म भी है। मगर इससे सरकार को कितना फायदा हो रहा है ? हर सीज़न में बीसीसीआई को 11–12 हजार करोड़ की कमाई हो रही है और उधर, फ्रैंचाइज़ियाँ भी 6–7 हजार करोड़ रूपये कमाती हैं। इसमें सीधा सीधा सरकार को कितना राजस्व मिलता है ?
बताया जाता है कि आईपीएल का समग्र व्यापारिक मूल्य अब 1.3 से 1.6 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, इसका फायदा किसे मिल रहा है ? चलिए माना कि टिकटों की बिक्री आदि से सरकार को जीएसटी के रूप में डेढ़ दो हजार करोड़ रुपया राजस्व मिल जाता है और आयकर के रूप में भी लगभग इतनी ही कमाई होती है मगर बात यदि सिर्फ कमाई की है तो ऑनलाइन गेमिंग में तो इससे कई गुना अधिक कमाई सरकार को ही रही थी । उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि यह आमदनी सालाना 27 हजार करोड़ रुपए तक जा पहुंची थी । यदि सरकार अपनी जनता को जुए की लत से बचाने के लिए इतनी बड़ी रकम कुर्बान कर सकती है तो फिर आईपीएल से भी क्यों पीछा नहीं छुड़ाती ? क्या मैच फिक्सिंग जैसी बड़ी बड़ी डील की खबरें सरकार तक नहीं पहुंचती ? चलिए यह काम तो गुप्त तरीके से होता होगा मगर देश की गली गली में इन मैचों को लेकर जो सट्टा चलता है, क्या उसकी भी कोई जानकारी सरकार के पास नहीं ? उस पर क्यों सरकार की आंख बंद है ? क्या ऐसा तो नहीं है कि सब कुछ जानते हुए भी सरकार की बस एक ही नीति हो – मीठा मीठा ग़प , कड़वा कड़वा थू ?