मुड़ के खोती बूड़ थल्ले

रवि अरोड़ा
सलमान रुश्दी का विवादित उपन्यास सेनेटिक वर्सेज भारत में प्रतिबंधित था अतः उसमे क्या लिखा है यह हम लोगों को नहीं पता । अपनी बात करूं तो मुझे इसे पढ़ने की कभी कोई इच्छा ही नहीं हुई । यूं भी जो किताब दुनिया भर में कोहराम मचा दे और जिसके कारण उसके प्रकाशक और अनुवादक समेत पचास लोगों की निर्मम हत्या कर दी जाए, उसे पढ़ने की जरूरत भी भला क्या है । सच बात तो यह है कि 1988 में लिखे गए इस बेतुके उपन्यास को दुनिया भूल ही चुकी थी मगर सलमान रुश्दी पर हुए प्राणघाती हमले ने एक बार फिर उसे चर्चा में ला दिया है । खास बात यह है कि इस बार चर्चा का केन्द्र उपन्यास और उसका लेखक कम और इस्लामिक आतंकवाद अधिक है । गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी अपनी तमाम असफलताओं से अवाम का ध्यान हटाने को अनेक देश फिर वही दशकों पुराना यह राग अब छेड़ देंगे। भारत जैसे देश में तो यह राग कभी बंद ही नहीं हुआ था मगर इसके बहाने अब और तेजी लाई जा सकती है । यानी दुनिया एक बार फिर वहीं खड़ी हो गई है जहां से तीन दशक पूर्व चली थी। मतलब मुड़ के खोती बूड़ थल्लेे ।

रुश्दी पर हमला करने वाले 24 वर्षीय हादी मतर के पैदा होने से भी एक दशक पहले लिखा गया था सेनेटिक वर्सेज । रुश्दी भारत में पैदा हुआ और ब्रिटेन का नागरिक है । अमेरिका से उसका कोई लेना देना भी नहीं है जहां उस पर ईरान समर्थक एक स्थानीय नागरिक द्वारा यह हमला किया गया । इस हिसाब से हादी मतर ने रुश्दी को पहले कभी देखा भी नहीं होगा । शायद उसने यह उपन्यास भी न पढ़ा हो मगर फिर भी हवाओं में घुले ज़हर के चलते उसने रुश्दी की हत्या की कोशिश की । ठीक इसी तरह हादी मतर को भी वे लोग नहीं जानते होंगे जो अब उसके नाम पर इस्लाम पर हमलावर होंगे । इस वारदात का ईरान में जिस तरह से स्वागत हो रहा है उसके इस्लाम विरोधी हवाओं को रोका भी कैसे जा सकेगा । ग्यारह सितंबर 2001 को अमेरिकी पर हुए घातक हमले के बाद पूरे यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और स्वयं अमेरिका में मुस्लिम नागरिकों पर अत्याचार की जो वारदातें हुईं थीं, कहना न होगा कि उनकी पुनर्रावृति की आशंकाएं अब और प्रबल हो उठेंगी । अपने देश भारत में तो ऐसे लोगों की जमात बहुत बड़ी है ही जो ऐसे ही किसी अवसर की ताक में रहती है । यानी इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दुनिया भर के मुसलमानों को कटघरे में खड़ा किया जायेगा । अफगानिस्तान, सीरिया, ईरान और पाकिस्तान जैसे देशों ने अपनी हरकतों से यूं भी इस्लाम को कहीं का नहीं छोड़ा है। कोई लाख बताए कि हमारी धार्मिक पुस्तक में फलां फलां अच्छी बातें लिखी हैं मगर दुनिया तो मानने वालों के आचरण से ही किसी धर्म के बारे में राय कायम करती है । आचरण जब खोमैनी और हादी मतर जैसा होगा तो अपने हमदर्दों को भी कोई धर्म कब तक अपने साथ जोड़े रख पाएगा ?

कट्टरवाद कैसा भी हो वह घातक है। कोई कवि, लेखक और पत्रकार ही अपनी बात न कह सके तो भला यह कैसी दुनिया होगी ? रुश्दी या उस जैसे किसी लेखक की किताब यदि ना पसन्द है तो उसका विरोध उसे न पढ़ कर ही किया जाना चाहिए । वैसे यदि दम खम हो तो उसके जवाब में अपनी किताब भी निकाली जानी चाहिए । मगर यह तो पूरी तरह अस्वीकार है कि किसी को अपने विचार व्यक्त करने से ही रोका जाए। बेहतर दुनिया का ख्वाब यदि हमें अपनी आंखों में संजोए रखना है तो यह तय करना ही पड़ेगा कि लिखे हुए शब्द का जवाब लिखा हुआ शब्द और विचार का जवाब विचार ही है चाकू अथवा पिस्तौल नहीं।

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