भारत पाक युद्ध के नायक प्रतिनायक

रवि अरोड़ा
शुक्र है कि युद्ध विराम हो गया । इतिहास गवाह है कि युद्ध किसी मसले का हल नहीं वरन् खुद एक मसला है। हालांकि यह संदेह अभी भी बना हुआ है कि इस ताज़ा सीज़फायर की उम्र कितनी होगी क्योंकि पाक सीज़फायर पर ज्यादा देर तक कायम नहीं रहता । अलबत्ता शांति प्रिय करोड़ों भारतीयों की तो यही प्रार्थना है कि नीली छतरी वाला दुश्मन देश को सद्बुद्धि दे और वह अपनी नापाक हरकतों से आइंदा बाज आए वरना भारत को मजबूरन फिर वैसा ही कड़ा कदम उठाना होगा जैसा सात तारीख की रात को उसने पाक स्थित आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के लिए उठाया था ।
बेशक युद्ध समाप्ति की औपचारिक घोषणा होना अभी बाकी है मगर मान कर चलना चाहिए कि दोबारा ऐसी नौबत नहीं आएगी और अब हमें मूल्यांकन करना चाहिए कि इस अल्प युद्ध में हमने क्या खोया और क्या पाया । यह भी पता लगाना चाहिए कि कौन हमारा असली दोस्त है और कौन तमाशबीन ? कौन इस युद्ध के नायक थे और वे लोग कौन थे जिन्होंने देश की किरकिरी करवाई ? मेरे खयाल से तो इजराइल और रूस के अलावा हमारे बाकी दोस्त दिखावटी निकले । इस अल्पयुद्ध के नायकों की सूची में सबसे ऊपर हमारी फौज के जज्बे, एस-400, राफेल, स्कैल्प मिसाइल, और स्वदेशी डिफेंस सिस्टम को रखा जाना चाहिए जिसके दम पर हमने न केवल दुश्मन को घर में घुसकर मारा अपितु उसके हर हमले को भी नाकाम करने में सफलता हासिल की। हालांकि पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमले संख्या में हमसे कहीं अधिक थे मगर प्रभाव में बेहद ही कमजोर साबित हुए । उम्मीद के मुताबिक मोदी सरकार ही नहीं विपक्ष के तमाम नेता और भारत की जनता ने भी सेना का मनोबल बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। बेशक कुछ भांड टीवी चैनल्स ने ऊल जलूल ख़बरें दिखा कर दुनिया भर में भारत की किरकिरी कराई मगर हमारे इस अभियान के नाम ऑपरेशन सिंदूर और उसकी सफल व संतुलित प्रेस ब्रीफिंग सेना की दो दो महिला अधिकारियों सोफिया कुरैशी और व्योमिका सिंह द्वारा किए जाने ने भी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा । यह देखना भी सुखद था कि जब बात भारत की आन बान और शान की आई तो ओवैसी जैसे वह विपक्षी नेता भी किसी से पीछे नहीं रहे जिनके हिस्से सर्वाधिक गालियां आती हैं।
मगर इस अल्प युद्ध की सबसे हैरानकुन बात यह रही कि शिमला समझौते और तमाम लंबे चौड़े दावों के बावजूद इस मामले में भारत ने तीसरे पक्ष अमेरिका की दखलंदाजी को सहज स्वीकार कर लिया जिसने बेहद बेशर्मी से सीजफायर की पहले घोषणा का अधिकार तक हमसे छीन लिया । बेशक सीजफायर स्वागत योग्य है मगर उसके तरीके ने तो भारतीय प्रधानमंत्री के कद को बेहद ही छोटा कर दिया है। दुखद है कि मन की बात कह कह कर दशक भर से जनता के सैंकड़ों घंटे बर्बाद करने वाले नेता से इतना भी न बन सका कि वे देश को संबोधित कर सकें। संकट की घड़ी में उनसे यह उम्मीद नहीं थी । यही नहीं उन्होंने इस मामले में दो बार बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी न जाने क्यों जाना तक गवारा नहीं किया। हमारे नेतृत्व की कमजोरी का ही परिणाम रहा कि 75 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि पाकिस्तान के साथ शुरू हुआ युद्ध “पाकिस्तान के समर्पण” पर नहीं वरन् युद्ध विराम पर समाप्त हुआ । हैरानी की बात है कि भारी नुकसान के बावजूद पाकिस्तान जीत की खुशी मना रहा है । उसका प्रधानमंत्री स्वयं बढ़ चढ़ कर इसकी घोषणा कर रहा है। मगर हमारे प्रधानमंत्री चुप हैं। हमें क्या मिला और क्या हमने खोया क्या यह बताने के लिए उन्हें सामने नहीं आना चाहिए ? क्या ये वही मोदी जी हैं जो हमले से पहले मिट्टी में मिला देने जैसी घोषणा कर रहे थे ? क्या वजह रही कि पाकिस्तान को झुकाने की बजाय वे ट्रंप के आगे झुक गए ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अब आगे भी वही होगा जो ट्रंप चाहेगा ? मामला कश्मीर का हो या सिंधु जल संधि का , आतंकवाद का हो या सीमा पर हो रही झड़पों का , बातचीत के मुद्दे वही होंगे जो अमेरिका तय करेगा ? तीनों सेना के अधिकारियों ने देश की वीर गाथा का जो खाका रविवार को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में खींचा , उससे हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हुआ मगर देश के राजनीतिक नेतृत्व के ताजा तरीन फैसलों को लेकर भी क्या ऐसा ही है ? शायद नहीं।

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