भक्तों को कहा सच्चाई सों काम

रवि अरोड़ा
साठ की उम्र हो गई और अब तक मैं यही समझता था कि बेशक लोकतन्त्र है मगर फिर भी अदालत के खिलाफ कुछ नहीं कहा जा सकता । उसके खिलाफ कुछ अभद्र लिखने की तो कभी भूल से भी भूल नहीं की। दरअसल जिन्होंने लिखना पढ़ना सिखाया उन्होंने अदालत के प्रति सम्मान और अवमानना का ऐसा डर दिल में बैठा दिया था कि ऐसा वैसा कुछ करने की कल्पना भी कभी नहीं कर सका । मगर उम्र के इस पड़ाव में आकर यह मिथ भी टूट गया । वैसे आज जब तमाम वर्जनाएं टूट रही हैं तो यह मिथक भी कब तक जिंदा रहता । सर्वोच्च न्यायालय जिसे लोकतन्त्र का भगवान ही कहा जाता था, उसे अब खुलेआम कोठा कहा जा रहा है। ट्विटर खोलकर देखिए #सुप्रीम_कोठा खूब ट्रेंड करता नज़र आएगा । फेसबुक व वाट्स एप आदि पर भी यही सब हो रहा है। ज़हर उगलने की कोई सीमा ही नहीं बची । खास बात यह कि फिर भी ये ज़हर खुरानी लोग खुद को पढ़ा लिखा, देश भक्त और लोकतन्त्र का प्रहरी कहते हैं । बेशक अब विरोधियों को बर्दाश्त करने की संस्कृति का क्षय हो चुका है मगर सुप्रीम कोर्ट और उसके माननीय जज भी दुश्मन करार दे दिए जाएंगे, इसकी तो मुझ जैसे लोगों ने कल्पना भी नहीं की थी।

नूपुर शर्मा की याचिका पर जज साहिबान ने अपनी अदालत में जो टिप्पणी की वह कितनी न्यायसंगत थी कितनी नही । उन्हें ऐसा कहने का अधिकार था अथवा नहीं, यह तो कानून के जानकार ही बता सकते हैं। मगर अपनी थोड़ी बहुत समझ के आधार पर मैं यह जरूर कह सकता हूं कि अदालत और जजों के खिलाफ अपमान जनक और भद्दी शब्दावली का सोशल मीडिया पर इस्तेमाल अदालत की सरासर अवमानना है और संविधान के आर्टिकल 129 व 142 के तहत ऐसे लोगों को कड़ी सजा सुनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास अपार शक्तियां हैं । कायदे से इन सब लोगों के खिलाफ़ आईटी एक्ट के तहत भी एफआईआर दर्ज़ होनी चाहिए मगर सबको पता है कि ये सब लोग कौन हैं, सो ऐसा करेगा भी कौन ? वैसे कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट के तहत स्वयं अदालत भी इन खुराफातियों को नोटिस भेज सकती है मगर जब दबंगई पर उतरे लोग एक दो नहीं वरन लाखों में हों तो अदालत भी क्या कर पाएगी। यूं भी नूपुर शर्मा मामले में हुए बवाल से अदालत सुरक्षात्मक स्थिति में होगी सो लफंगई को रोकेगा कौन ? वैसे यह मुल्क अब संविधान, नियमों व कानून से चल ही कहां रहा है जो कोई इस तरह की बातों की परवाह करे ? चारों ओर मनमर्जियों का आलम है और उसकी जद से बाहर अब कोई नहीं। जी हां सुप्रीम कोर्ट भी नहीं।

अजब संस्कृति विकसित हुई है। अपने खिलाफ़ पत्ता खड़कना तक सत्ता धारियों और उसके समर्थकों को बर्दाश्त नहीं होता । खिलाफ़ जाने वालों के खिलाफ हर वाजिब गैर वाजिब हथकंडा अपनाया जा रहा है। अपराधी सत्ताधारी दल का है तो उसके सात खून मुआफ और यदि गैर है तो एफआईआर, जेल, बुलडोजर और न जाने क्या क्या हाज़िर है। अब देखिए न , फसाद की जड़ नूपुर शर्मा छुट्टी घूम रही है और ठीक उसी अपराध में पत्रकार जुबैर सलाखों के पीछे है । सुनवाई के दौरान नूपुर शर्मा से जजों ने जो कहा लगभग वही देश की आधिकांश जनता महसूस कर रही थी और उसी के अनुरूप उनकी कही गई टिप्पणी फैसले नहीं वरन ‘ओब्जरवेशन’ की श्रेणी में आती है । देश दुनिया की तमाम अदालतों में जज ऐसा करते ही हैं और यह आदेश का हिस्सा भी नहीं माना जाता मगर हाय रे! भक्तों को कहा सच्चाई सों काम ।

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