बंगला और बगुला

रवि अरोड़ा
बारह साल पहले लगभग यही दिन थे। दिल्ली रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का आमरण अनशन चल रहा था। वहीं एक दुबला पतला सा आदमी आजतक न्यूज चैनल वालों को इंटरव्यू दे रहा था। उसकी बातों में दृढ़ता, आंकड़ों में तथ्यात्मकता और शब्दों के चयन में गज़ब की स्पष्टता थी। मैं ठीक उसकी बगल में खड़ा था और उसकी बातों से उतना ही प्रभावित होता जा रहा था जितना कभी कम्युनिस्ट पार्टियों, जेपी के आंदोलन और बाद के दिनों में वीपी सिंह से हुआ था। उन्होंने भी तो इसी तरह मन में अनेक उम्मीदें जगाई थीं। मगर इस व्यक्ति अरविंद केजरीवाल ने जब कुछ महीनों बाद ही अन्ना हजारे से अलग होकर अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली तो मन पुनः सपनों के धराशाई होने की आशंकाओं से भर उठा । लेकिन केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के अपने पहले चुनाव में जिस तरह से कार बंगला आदि सुविधाएं न लेने जैसी बातें कहीं तो फिर दिल को किसी तरह समझा लिया । सिर पर मफलर, पेंट से बाहर निकली हुई कमीज और पांवों में साधारण सी उनकी चप्पलें कुछ भरोसा भी तो दिलाती थीं मगर हाय री मुल्क की राजनीति! तीन बार मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल ने परत दर परत इस कदर अपनी कलई उतारी कि मन खिन्न ही हो उठा है। पिछले दस सालों में उन्होंने हर वह काम किया है जिसकी कभी उन्होंने निंदा की थी । बेशक मुल्क में बड़े बड़े बेईमान नेता हुए हैं और आज भी 100 में से 99 नेता बेईमान हैं। चंद को छोड़ कर लगभग सभी ने पूरी बेशर्मी से अपनी केंचुली भी उतार दी है मगर फिर भी बड़ी बड़ी बातें करके पूरी नंगई पर उतरने में तो केजरीवाल सबसे आगे निकलते दिख रहे हैं।

खबरें बता रही हैं कि केजरीवाल ने नियमों को ताक पर रखकर सिविल लाइन्स में अपना नया बंगला बनवा लिया है और उस पर जनता के टैक्स से मिले 44 करोड़ 78 लाख रुपए खर्च कर दिए हैं। एक करोड़ रुपए के तो केवल परदे ही लगाए गए हैं। कोरोना संकट के दिनों में यह सब किया गया मुख्यमंत्री आवास की मरम्मत करने के नाम पर । बेशक पूरे मुल्क में जनता के पैसों की लूट और बर्बादी आजादी के बाद से ही हो रही है । केंद्र और राज्यों में होड़ लगी हुई है कि कौन कितने पैसे लुटाता है । हालांकि टूटी चप्पलों में घूमने वाले लगभग सभी नेता मंत्री मुख्यमंत्री बनते ही सैंकड़ों हजारों करोड़ के आदमी बन जाते हैं मगर फिर भी केजरीवाल सर्वाधिक दिल दुखाते हैं। उनका मामला सबसे अलग भी तो है। दरअसल दूसरे बेईमान नेताओं ने तो हमेशा केवल जाति धर्म की बात की। ईमानदारी का सौदा तो किसी ने अपनी दुकान में रखा ही नहीं मगर ये केजरीवाल तो बात ही ईमानदारी की करते थे । उन्होंने तो सिर्फ ईमानदारी बेची और जाति धर्म पर हल्का हाथ रख कर कुछ ऐसी उम्मीदें भी जगाई थीं। अब चोरों ने चोरी की तो काहे का गिला मगर साधू बन कर कोई यह सब करें तो कैसे बर्दाश्त हो ? सुना है कि केजरीवाल का बंगला 21 हज़ार स्क्वायर फीट का है। एक कमरे में रहने की बात करने वाला यह सब करे तो भला अपने दिल को कैसे समझाएं ? कार न लेने की घोषणा करने वाला 28 गाड़ियों के काफ़िले में चले तो कैसे यह स्वीकार कर लें ? हो सकता है कि भ्रष्टाचार किए बिना देश में राजनीति संभव न हो मगर इसके लिए ईमानदारी का ढोंग करना कहां जरूरी है ? केजरीवाल सरकार के मंत्री भ्रष्ट्राचार में जेल गए मगर जनता ने उन्हें संदेह का लाभ दिया कि हो सकता है केन्द्र सरकार ने खुन्नस में यह सब किया हो मगर इस बंगले वाले मामले का तो केन्द्र को भी पता नहीं चला । मुआफ कीजिए केजरीवाल जी आपने उन सभी देशवासियों का दिल तोड़ा है जो अभी भी मानते हैं कि देश में ईमानदारी से भी राजनीति हो सकती है।

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