नूपुर शर्मा के बहाने बैजा बैजा

रवि अरोड़ा
अदब और साहित्य की दुनिया हजारों साल से जिस अंदाजे बयां की दुहाई देती रही है वह एक बार फिर निलंबित भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा की सांप्रदायिक टिप्पणी से दरपेश हुआ है । बेशक नूपुर शर्मा ने अपने अंदाज में जिस बात को कहा , उसे मुस्लिम उलेमा भी जमाने से बताते आए हैं और इसकी तस्दीक करते मुस्लिम स्कॉलर के अनेक वीडियो भी यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं मगर बात तो नूपुर शर्मा के अंदाजे बयां और मंशा से ही बिगड़ी । यूं भी जब दूसरे धर्म और उसके मानने वालों को बात बात पर पानी पी पी कर कोसा जाए अथवा उन पर कीचड़ उछाला जाए तो कभी न कभी तो चीजें ट्रिगर होनी ही थीं । मुस्लिम दुनिया बेशक आज नूपुर शर्मा की टिप्पणी से नाराज़ दिख रहा है मगर सच्चाई यही है कि यह एक दो बातों की नहीं वरन उन हजारों बातों की प्रतिक्रिया है जो भगवा पार्टी जमाने से मुस्लिमों के खिलाफ करती आ रही है ।

भाजपा प्रवक्ता की टिप्पणी से उठे तूफान पर तमाम तरह की बातें की जा रही हैं । जहां मुस्लिम जगत इससे बेहद नाराज़ है वहीं हजारों कट्टरपंथी हिंदू भी अब नूपुर के बचाव में आगे आ गए हैं । मेरी नज़र में इस मामले के एक दो नहीं वरन पूरे आधा दर्जन पहलू हैं । पहला पहलू तो बेशक स्वयं नूपुर शर्मा ही है मगर दूसरा भाजपा, तीसरा देश, चौथा समाज, पांचवा परंपराएं और छठा पहलू विपक्षी दल भी हैं । पहले पक्ष नूपुर की करें तो उसका भविष्य अब उज्ज्वल ही उज्ज्वल है । मुल्क में जिस तरह की राजनीति अब हो रही है उसमें अब नूपुरों के लिए ही तो स्कोप बचा है । बेशक अब वह जेल भी चली जाए मगर देश की राजनीति का बड़ा चेहरा होने से अब स्वयं भाजपा नेतृत्व भी उसे रोक नहीं पाएगा । दूसरे पहलू भाजपा की बात करें तो सतही तौर पर लग रहा है कि पार्टी अपने बड़बोले प्रवक्ताओं की वजह से फंस गई है और बचाव की मुद्रा में है मगर यह सच को अधूरा देखने जैसा ही होगा । हकीकत यह है कि जिस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नाव पर बैठ कर वह केंद्र और राज्यों में बार बार अपनी सरकारें बनाने में सफल होती है, यह मामला उसे और तेज करता है और तमाम असफलताओं के बीच 2024 में भाजपा का खेवनहार इसी ध्रुवीकरण को ही तो होना है । तीसरे पहलू देश की बात करें तो उसके हिस्से तो हार ही हार आनी है । खाड़ी देशों से 60 फीसदी तेल आता है , वहां काम कर रहे एक करोड़ भारतीयों से देश की आधी आमदनी होती है और निर्यात की भी बात करें तो अमेरिका के बाद सर्वाधिक निर्यात भी वहीं होता है । नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को लेकर गुस्साए 15 मुस्लिम देश भाजपा के फ्रिंज एलिमेंट जैसे बयान से संतुष्ट नहीं हुए, जैसा कि लग भी रहा है तो इसकी भारी कीमत देश को चुकानी पड़ सकती है । बात समाज की करें तो उसकी भी झोली से बचा खुचा सौहार्द जाता दिख रहा है । अब से पहले देश का मुस्लिम अधिक वाचाल नहीं था मगर अब उसके नेताओं को भी तल्ख़ और जहरीली बातें कहने का मौका मिल गया है । परंपराओं के हवाले से बात करें तो भी हम किस मुंह से डेड हज़ार साल पहले हुए निकाह में दुल्हन की उम्र की बात कर सकते हैं क्योंकि मात्र सौ साल पहले यानी पहले विश्व युद्ध तक तो सभी धर्मों और देशों में ऐसा होता ही रहा है । बेशक आज हम खुद को प्रगतिशील समाज होने का दावा कर रहे हैं मगर हमारी आने वाली नस्लें ही हमें दहेज और महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने जैसे तमाम दकियानूसी क्रियाकलापों के चलते कटघरे में खड़ा करने वाली हैं । अब बात करें मुल्क के विपक्षी दलों की तो उसके तो जैसे राहजनी ही हो गई है । मुस्लिम परस्त दिखने का साहस कोई दल अब कर नहीं सकता और सॉफ्ट हिंदुत्व को हिंदू समाज भाव ही नहीं दे रहा । कुल जमा बात करें तो इस प्रकरण से भाजपा और नूपुर की तो बैजा बैजा हो गई मगर बाकी सबकी मंडी लुट गई ।

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