धराली के सबक

धराली के सबक
रवि अरोड़ा
उत्तराखंड मेरे लिए दूसरे घर जैसा है और आए दिन मैं वहां पहुंचा रहता हूं, हालांकि मेरा सुरक्षित स्थानों पर ही जाना होता है। विगत पांच अगस्त को गंगोत्री जाने वाले जिस राजमार्ग संख्या 34 स्थित गांव धराली में आपदा आई, मैं भी उसी राज मार्ग पर टिहरी के निकट ठहरा हुआ था । बेशक मेरे होटल से धराली काफी दूर था मगर हादसे के खौफ ने मुझे भी हिला दिया । राज्य के अधिकांश इलाकों में लगातार दो दिन से बरसात हो रही थी और जगह जगह पहाड़ से मलबा और पत्थर सड़कों पर गिर रहे थे । धराली में तो मलबे और पानी का सैलाब महज कुछ ही मिनटों में मार्केट, घर, होटल और मंदिर तक को अपने साथ बहा ले गया । यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि लोगों के पास बचने का कोई जरिया ही नहीं बचा था । हादसे में मरने वालों और लापता लोगों की सही सही जानकारी तो खैर कभी बाहर नहीं आएगी मगर इतना तय है कि नुकसान बहुत बड़ा है। मारे गए अथवा लापता लोग गंगोत्री धाम यात्रा हेतु वहां पर आए थे। खबरें बता रही हैं कि चार धाम यात्रा में इस साल हादसों की जैसे बाढ़ सी ही आ गई है और गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार अब तक दो सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। क्या पर्यावरणविदों की वे तमाम आशंकाएं सही साबित नहीं हुईं कि बेतहाशा सड़कों और अन्य कथित विकास परियोजनाओं का बोझ हिमालय झेल नहीं पायेगा और ऐसा करके हम केवल विनाश को ही दावत देंगे ?
आंकड़ों पर निगाह डालें तो उत्तराखंड में 2018 से अब तक भूस्खलन की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है । वर्ष 2018 में 216, वर्ष 2019 में 254, वर्ष 2020 में वर्ष 328, वर्ष 2021 में 354, वर्ष 2022 में 245 और वर्ष 2023 में 1,100 से अधिक भूस्खलन की घटनाएं दर्ज हुईं । वर्ष 2024 में मानसून शुरू होने के बाद मात्र 17 दिनों में 1,521 भूस्खलन दर्ज किए गए। वर्तमान वर्ष के आंकड़े अभी प्रकाश में नहीं आए हैं। उधर , गौर करने लायक आंकड़ा यह भी है कि साल 2020 में लगभग 3.5 लाख तीर्थयात्री राज्य में पहुंचे थे । साल 2021 में लगभग 7.5 लाख, साल 2022 में लगभग 46 लाख, साल
2023 में कुल 56.13 लाख, साल 2024 में 48.11 लाख तीर्थयात्री चार धाम और हेमकुंड साहिब की यात्रा पर आए थे । साल 2025 के लिए पूर्ण आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि यात्रा अभी चल रही है । इस वृद्धि का प्रमुख कारण तीर्थ यात्रियों को आकर्षित करने के लिए बनाई गई ऑल वेदर रोड और अन्य विकास कार्यों को ही माना जाता है। वर्ष 2018 से राज्य में निर्माण कार्य तेज हुए और उसके तहत 889 किमी सड़कों का चौड़ीकरण किया गया। माना जाता है कि सड़क चौड़ीकरण से भूस्खलन की घनत्व दोगुनी हो जाती है, क्योंकि पहाड़ों की कटाई और वनस्पति हटाने से ढलानों की अस्थिरता बढ़ जाती है। पर्यावरणविदों का स्पष्ट कहना है कि अवैज्ञानिक निर्माण और पर्यावरण नियमों की अनदेखी से ही ये घटनाएं बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए, 2022 में चार धाम मार्गों पर 811 भूस्खलन हुए, जिनमें 81 फीसदी सड़क चौड़ीकरण वाले क्षेत्रों में थे।
यह दुर्भाग्य पूर्ण ही है कि अनेक राज्यों और केंद्र सरकार धार्मिकता के दिखावे का ऐसा प्रोपेगेंडा करने में लगी हुई हैं कि लोगबाग तीर्थ स्थलों की ओर यूं दौड़े चले जाते हैं, जैसे वह कोई पिकनिक हो। नतीजा कभी कुंभ, कभी कांवड़, कभी अमरनाथ तो कभी चार धाम यात्रा में अपने प्राण गंवा बैठते हैं। धर्म लाभ के नाम पर सड़क दुर्घटना और भगदड़ में जान गंवाने वालों की गिनती भी हैरान कर देने वाली है। क्या यही वह समय नहीं कि हम अपनी धार्मिकता की सही सही पहचान करें और यूं ही किसी के आह्वान पर मुंह उठा कर असुरक्षित धार्मिक यात्रा पर न निकलें ? सरकारें भी अपना वोट बैंक बढ़ाने के चक्कर में लोगों की जान और प्रकृति से यूं न खेलें कि मौत को अपना तांडव करने का बैठे बिठाए मौका मिल जाए । धराली की घटना से भी यदि कोई सबक नहीं लिया गया तो यकीनन किसी दिन कुछ ऐसा भयावह घटित हो जाएगा, जिसकी अभी तक कल्पना भी नहीं की गई है ।

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