ड्रामा ही सही मगर कुछ कीजिए तो

रवि अरोड़ा
सच्चाई क्या है यह कोई नहीं जानता मगर जो साफ साफ दिख रहा है वह यह है कि भारतीय कुश्ती महासंघ का अध्यक्ष ब्रज भूषण शरण सिंह यदि सत्तारूढ़ भाजपा का सांसद नहीं होता तो कब का सलाखों के पीछे होता । भला क्या यह संभव है कि देश के वे तमाम स्टार खिलाड़ी जो देश के लिए अनेक मैडल जीत कर लाए, वे इस नेता पर एक दो नहीं बल्कि हज़ार महिलाओं का यौन शोषण का आरोप लगाएं और तमाम शिकायतों के बावजूद अव्वल तो पुलिस एफआईआर दर्ज न करे और जब सर्वोच्य न्यायालय के निर्देश पर उसे करनी पड़ जाए तो आरोपी से पूछताछ की हिम्मत तक न जुटा सके ? क्या यह कोई सामान्य सी बात है कि जंतर मंतर पर जहां देश भर से आए मामूली से मामूली आदमी को भी ससम्मान धरना देने की इजाज़त है वहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इन खिलाड़ियों को कायदे से विरोध प्रदर्शन भी नहीं करने दिया जा रहा ? कभी उनकी बिजली काट दी जाती है तो कभी गेट बंद कर उन तक खाना और पानी भी नहीं पहुंचने दिया जा रहा ? क्या इसे भी सामान्य सी बात मान लिया जाए कि तीन महीने से चल रहे इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दखल देना पड़े और इसके बावजूद दो दिन तक शिकायत कर्ता खिलाड़ियों को एफआईआर की प्रति तक उपलब्ध नहीं कराई जाए ? यह ढुलमुल रवैया क्या उसी सरकार का है जो मानहानि के छोटे से मामले में अदालती फैसला आने के बाद मिनटों में ही राहुल गांधी के खिलाफ सक्रिय हो गई थी ?

रविवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम का सौवां एपिसोड था । सबको पहले से ही मालूम था कि मोदी जी दाएं बाएं की सारी बातें करेंगे मगर काम की बातों पर चुप्पी ही साधे रखेंगे। मगर न जाने क्यों मुझे फिर भी उम्मीद थी कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाले मोदी जी धरने पर बैठी बेटियों के बाबत अवश्य ही कुछ कहेंगे। इस उम्मीद का मुख्य कारण यह भी था कि ये बेटियां जब मैडल जीत कर लाई थीं तो मोदी जी ने अपने आवास पर बुला कर उनका स्वागत भी किया था । मगर हाय रे मोदी जी के सलाहकार, उन्होंने मोदी जी से स्वच्छ भारत, खादी और अमृत महोत्सव जैसी तमाम अप्रासंगिक बातें कहलवाईं मगर पहलवानों का जिक्र तक नहीं करवाया ।

हो सकता है कि ब्रज भूषण सिंह बेकसूर हों और उनके खिलाफ कोई षड्यंत्र रचा जा रहा हो। पहलवानों के धरने पर जिस तरह विपक्ष के नेता दल बल के साथ आजकल पहुंच रहे हैं उससे मामले के राजनीतिकरण होने की भी आशंका भरपूर है मगर सवाल यह है कि इस सबमें सरकार कहां है ? कहीं उसे सिंह के खिलाफ कार्रवाई करने पर उत्तर प्रदेश के राजपूत मतदाताओं के छिटकने का डर तो नहीं सता रहा ? अथवा क्या वह इस बात से तो नहीं डर रही है कि सिंह छह बार का सांसद है ? यदि ऐसा है तो कोई सरकार को क्यों नहीं समझा रहा कि किसी एक जाति से अधिक वोट तो आधी आबादी महिलाओं के हैं, उनके बीच अपनी अच्छी और निष्पक्ष छवि बनाना जरूरी नहीं है क्या ? रहा सवाल सांसद होने का तो सांसद अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी भी तो थे और अपने अपने क्षेत्र में सिंह से भी बड़े नेता थे । कानून व्यवस्था के मुद्दे पर जब उन्हें मिट्टी में मिलाया जा सकता है ये सिंह कौन सी बड़ी चीज है ? क्या सरकार को नहीं मालूम कि उत्तर प्रदेश की अपराध की दुनिया मे सिंह भी जाना पहचाना चेहरा है। उसपर भी हत्या, आगजनी और तोड़फोड़ के चालीस से अधिक मुकदमे हैं। क्यों नहीं इसके बहाने अपनी साफ सुथरी छवि बनाई जाती ? क्या सरकार को ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे महिलाओं और खिलाड़ियों में कोई अच्छा संदेश जाए ? चलिए कुछ मत कीजिए मगर कम से कम न्यायप्रिय और निष्पक्ष होने का ड्रामा तो कर कीजिए ?

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