चोर की माँ

रवि अरोड़ा
उन दिनो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े बड़े बाहुबलियों का बोलबाला था । तभी कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने शैलजाकांत मिश्र को ग़ाज़ियाबाद का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बना कर भेजा । श्री मिश्र ने अपराधियों के दिलो में पुलिस का जो ख़ौफ़ पैदा किया वह उनके जाने के कई साल बाद तक क़ायम रहा । शायद 1991 का कोई महीना था जब उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बाहुबली डीपी यादव के घर की कुर्की करा दी । पुलिस डीपी यादव के घर की चौखटें तक उखाड़ कर ले गई । गैस पर गर्म हो रहा दूध तक पुलिस ने ज़ब्त कर लिया और बाक़ी बड़ा समान तो उठाया ही बिजली के बल्ब और ट्यूब तक ट्रकों में भर कर कवि नगर थाने पहुँचा दिए गए । गिरफ़्तारी के बाद हुई प्रेस काँफ़्रेंस में एसएसपी स्वयं डंडे से बदमाश को पीटते थे । कार मोटर साइकिल पर बड़े बड़े शब्दों में अपनी जाति लिखने वालों को पकड़ कर चालक के नाखूनों से ही उसे खुरचवाया जाता था । बेशक यह सब तरीक़े ग़ैर क़ानूनी थे मगर इन्हीं से शहर में अपराध और अपराधियों की कमर टूटी । पुलिस का इक़बाल क्या होता है यह ग़ाज़ियाबाद वालों ने पहली बार देखा । लोगों को पता चल गया कि पुलिस चाहे तो कुछ भी कर सकती है । उसके पास अपने हर एक्शन के लिए तर्क हैं और कमोवेश क़ानूनी बचाव के रास्ते भी । कानपुर शूटआउट में अपने आठ साथियों को शहीद करवा चुकी पुलिस ने जिस तरह से बदले की कार्रवाई करते हुए गैंगस्टर विकास दुबे के घर को नेस्तनाबूद किया है , उसके लिए भी यक़ीनन उसके पास बचाव के तमाम रास्ते और तर्क होंगे ।
बेशक पुलिस की इस कार्रवाई का विरोध हो रहा है मगर ज़माने तक क्राइम रिपोर्टिंग करने के कारण मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि हमारे तमाम नियम-क़ानून अपराधियों की तरफ़ खड़े हैं और उनका अक्षरश पालन करके अपराधियों को क़तई सज़ा नहीं दिलवाई जा सकती । विकास दुबे पिछले तीस साल से अपराध की दुनिया का बादशाह था और क़ानूनी पेचीदगियों की वजह से ही उसे कभी सज़ा नहीं हुई । संगीन अपराधों के साठ मुक़दमों के बावजूद पूरी व्यवस्था अब तक उसी के पक्ष में खड़ी थी । ज़ाहिर है कि बदले की आग में जल रही पुलिस उसे अब ज़िंदा नहीं छोड़ेगी और यक़ीन जानिये यदि एसा न हुआ तो वह फिर शर्तिया ज़मानत पर बाहर होगा । कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले वक़्त में कभी वह एमएलए एमपी भी बन जाये । अब आप बताइये यह व्यवस्था विकास दुबे जैसे लोगों के साथ है अथवा उनके जो उनका शिकार बनते हैं ? बेशक यह मानवाधिकारों का उल्लंघन था मगर योगी सरकार ने शुरू शुरू में जिस तरह से अपराधियों के पैरों में गोलियाँ मारनी शुरू की थीं उसका क्राइम ग्राफ़ पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा था । कानपुर शूटआउट के बाद यक़ीनन यह तरीक़ा फिर से पुलिस को अपनाना पड़ेगा । बेशक यह ग़ैरक़ानूनी होगा और इसके तमाम ख़तरे भी हैं । सबसे अधिक आशंका तो पुलिस के निरंकुश होने की ही रहेगी मगर फिर भी पहली प्राथमिकता तो बढ़ते अपराधों पर अंकुश ही है ना ?
तज़ुर्बे से कह रहा हूँ कि विकास दुबे पैदा नहीं होते बनाये जाते हैं । बदमाश को समाज में जो ‘ भाई साहब ‘ का दर्जा मिलता है । दौलत और शोहरत जिस तरह से दौड़ती हुई उसके घर आती है और चुनावों में जिस तरह से उनकी ड्योढ़ी पर बड़े बड़े नेता माथा टेकते हैं उन्ही से ये रक्तबीज जन्मते हैं ।सपा बसपा और भाजपा जैसे बड़े दलों में विकास दुबे के सम्बंध इसके गवाह हैं । आख़िर क्या वजह कि तमाम नियमों क़ानूनों और सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती के बावजूद 143 एसे लोग इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुँच गए जिनके ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं ? साफ़ सुथरी राजनीति की बातें करने वाली भाजपा के 37 फ़ीसदी यानि 83 नेता एसे हैं । सपा के 47 में से 14 , बसपा के 19 में से 5 व कांग्रेस के 7 में से 1 आपराधिक प्रश्ठभूमि वाला है । जो साफ़ सुथरे दिख रहे हैं उनमे से भी कितने इन विकास दुबे जैसों की मेहरबानी से विधानसभा में पहुँचे, कहा नहीं जा सकता है । विकास दुबे मारा जाएगा, यक़ीनन मारा जाएगा मगर काश हम चोर से पहले चोर की इस माँ को मार पाते जिसकी कोख से ये लोग पैदा होते हैं ।

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