गौशालाओं का घेवर कनेक्शन
गौशालाओं का घेवर कनेक्शन
रवि अरोड़ा
हरियाणा के सोनीपत में जा बसे मित्र त्रिपतजीत सिंह बावा जी मिलने आए और साथ में खरखोदा के आठ गांवों के संयुक्त प्रयास से सैदपुर में चल रही अठगावां गौशाला का बना घेवर भी ले आए । उन्हीं से पता चला कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस गौशाला का घेवर इतना मशहूर है और लंबी लंंबी लाइनें लग कर बिकता है। बिना चीनी और शुद्ध देशी घी और मावे से बने इस घेवर से यह गौशाला साल में एक से डेढ़ करोड़ रुपए कमा लेती है और यह राशि गौशाला में गौ सेवा पर ही खर्च होती है। गौशाला केवल सावन के महीने में ही घेवर बनाती है और अपनी विवाहित बहन बेटियों को तीज अथवा सिंधारा के उपहार के रूप में भेजने के लिए लोगबाग यहां का घेवर जमकर खरीदते हैं। खोजबीन की तो पता चला कि सैदपुर ही नहीं दिल्ली सीमा से लगे अनेक अन्य स्थानों पर भी गौ सेवा का यह अनूठा प्रयोग चल रहा है और लोगबाग घेवर की खरीद के साथ साथ धर्म लाभ के भाव से भी सावन के महीने में इन गौशालाओं का पता पूछते पूछते आते हैं।
विवाहित बहन बेटियों के सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए तीज और सिंधारा के उपहार देने का चलन पूरे उत्तरी भारत में है, बेशक इसके नाम अलग अलग हैं। खास बात यह है कि उपहार में घेवर अवश्य ही होता है। अब मांग है तो उसकी आपूर्ति भी होगी । नतीजा बीकानेर, हल्दीराम, बंगाली स्वीट्स, चेना राम और नाथू स्वीट्स जैसी बड़ी मिठाई की दुकानों पर इस सीजन में थोक के भाव घेवर की बिक्री होती है। इसी तर्ज पर अब मैदान में गौशालाएं भी उतर आई हैं और अपारंपरिक रूप से भारी मात्रा में घेवर की बिक्री कर रही हैं। शुरुआत हुई थी कुछ साल पहले दिल्ली से सटे हरियाणा के गांवों से, जिसमें गोहाना क्षेत्र के पिनाका गांव, पानीपत की कर्मयोगी सिवाह गौशाला व सैदपुर की गौशाला प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त तिहाड़ गौशाला, मुंडलाना गौशाला, कास गौशाला, हांडी गौशाला, सिसाना गौशाला, गनौर गौशाला, बड़ी ब्राह्मण गौशाला, भटगांव गौशाला और मर्थल गौशाला जैसी संस्थाएं भी घेवर की बिक्री में संलग्न हैं। कहना न होगा कि यहां घेवर की कीमत बाजार से बेहद कम रखी जाती है और ये गौशालाएँ घेवर को अपने शुद्ध देशी घी और दूध से बनाती हैं । खास बात यह भी है कि इससे होने वाली कमाई का उपयोग केवल गौ-सेवा, गौशाला के रखरखाव और सामाजिक कार्यों के लिए किया जाता है। घेवर की बिक्री से एक महीने में ये गौ शालाएं इतनी कमाई कर लेती हैं कि उनके सारे साल का खर्च निकल आता है।
हम सभी जानते हैं कि घेवर का सावन में खाया जाना सांस्कृतिक परंपराओं, त्योहारों, और मौसम की खासियतों का मिश्रण है। यह मिठाई न केवल स्वादिष्ट होती है, बल्कि बरसात के मौसम में उत्सवों की खुशी को और बढ़ाती है।
बेशक पारंपरिक रूप से यह राजस्थानी मिठाई है मगर अब दिल्ली , उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे क्षेत्रों में भी घर घर पहुंच गई है। इसके सावन में लोकप्रिय होने के पीछे सांस्कृतिक, पर्यावरणीय, और सामाजिक कारण भी हैं। भगवान शिव को समर्पित होने के कारण सावन का महीना हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है । इस दौरान रक्षाबंधन, तीज और अन्य स्थानीय उत्सव भी मनाए जाते हैं। घेवर इन त्योहारों, विशेष रूप से तीज और रक्षाबंधन, के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। सावन में घेवर बनाना और बाँटना एक पुरानी परंपरा है, जो सामुदायिक एकता और खुशी को दर्शाती है । सावन में बरसात का मौसम होता है, और घेवर एक तली हुई मिठाई है, जो नम मौसम में गर्म और ताज़ा खाने के लिए उपयुक्त होती है। इसकी कुरकुरी बनावट और मिठास बरसात के ठंडे माहौल में आनंददायक लगती है । चूंकि घेवर बनाने में मुख्य रूप से मैदा, घी, चीनी, और दूध का उपयोग होता है, जो सावन में आसानी से उपलब्ध होते हैं। बरसात में ताजा दूध और घी की गुणवत्ता अच्छी होती है, जो घेवर के स्वाद को बढ़ाता है। घेवर को चाशनी में डुबोकर बनाया जाता है, जिससे यह कुछ समय तक ताज़ा रहता है। यही कारण है कि यह बरसात के मौसम में, जब खाद्य पदार्थ जल्दी खराब हो सकते हैं, यह एक उपयुक्त मिठाई है। ऐसे परिवेश के केंद्र में ही संचालित हो रही हमारी गौशालाओं को चूंकि अपने परिसर में ही संपूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता और ग्राहकों की अपने इर्द गिर्द मौजूदगी ने ही शायद इस मैदान में उतारा है। घेवर को लेकर आपकी राय कुछ अलग हो सकती है मगर घेवर का गौशाला कनेक्शन पता चलने से मेरी तो इसके प्रति प्रीति और अधिक बढ़ गई है। हमारे समाज में चारों और इन दिनों नित नए प्रयोग हो रहे हैं। क्या यह हर्ष का विषय नहीं है कि अब हमारी गौशालाएं भी केवल दान पुण्य के भरोसे न रह कर स्वयं कर्मयोग में संलग्न हो रही हैं ? काश दूसरों के भरोसे चल रही अन्य संस्थाएं भी इन गौशालाओं से कुछ सबक लें।