गलती न सुधारने की जिद !
गलती न सुधारने की जिद !
रवि अरोड़ा
बहुत दिनों के बाद धौलाना के निकट आज कुछ नवयुवकों को सड़क पर दौड़ लगाते देखा। हालांकि तीन साल पहले लगभग रोज ही दौड़ लगाते लड़के दिखाई दे जाते थे । ये नवयुवक सेना और अन्य सुरक्षा बलों में भर्ती हेतु अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाने को नियमित अभ्यास में लगे रहते थे । मगर साल 2022 में भारत सरकार ने अपनी अग्निवीर योजना प्रारंभ की और इससे निराश नवयुवकों ने फौज में जाने का सपना देखना लगभग छोड़ ही दिया । सड़क पर दौड़ लगा रहे इन नवयुवकों को आज फिर देख कर कौतूहल जगा और उन्हें रोककर अपनी जिज्ञासा का निराकरण करने की मैंने कोशिश की । मैं यह जानने को बेताब था कि आखिर क्या वजह हुई कि अग्निवीर योजना के बाद से आप लोग यूं दिखने बंद हो गए थे और अब अचानक ऐसा क्या हुआ कि आप लोग फिर से दिखाई पड़ रहे हैं ? उन युवकों ने सबसे पहले तो मेरे इस भ्रम को तोड़ा कि वे लोग अग्निवीर की भर्ती के लिए यूं अभ्यास कर रहे हैं। उनकी यह सारी मशक्कत तो उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाहियों की भर्ती हेतु थी । इसके बाद मेरा अगला आधा घंटा उन युवकों के साथ सैनिकों की भर्ती पर सवाल जवाब में गुजरा । अब इसी बातचीत और बाद में की गई उसकी तहकीकात में आपको शामिल करने की गरज से मैं यह पंक्तियां लिख रहा हूं।
भारतीय सशस्त्र बलों में युवाओं की भर्ती के लिए अल्पकालिक अनुबंध-आधारित सेवा मॉडल अग्निवीर के बारे में आपकी क्या राय है , मुझे नहीं मालूम मगर जिन युवकों से इसमें शामिल होने की उम्मीद हम करते हैं, वे तो इससे पूरी तरह निराश हैं । सरकार का दावा था कि इस योजना से सशस्त्र बलों में औसत आयु कम होगी और तकनीकी रूप से कुशल, युवा सैनिकों की भर्ती हो सकेगी। चार वर्ष की सेवा के बाद ये युवा विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के लिए तैयार होंगे और 25% अग्निवीरों को स्थायी नौकरी का अवसर भी मिलेगा। इस योजना का एक उद्देश्य पेंशन और अन्य दीर्घकालिक वित्तीय देनदारियों को कम करके रक्षा व्यय को संतुलित करना भी था । कहना न होगा कि अपने इस आखिरी उद्देश्य में तो सरकार सफल हुई है मगर बाकी के ऐच्छिक परिणाम उसे प्राप्त नहीं हुए । सरकार का दावा था कि मार्च 2026 तक 1 लाख 75 हजार अग्निवीर सैनिकों की भर्ती कर ली जाएगी मगर जुलाई 2025 तक 1 लाख 20 हजार भर्तियां ही हुई हैं। केवल 2022 में ही लक्ष्य के अनुरूप भर्तियां हुईं और बाकी के साल निराशाजनक ही रहे । साल 2022-2023 में इस योजना हेतु 34 लाख आवेदन आए थे मगर 2023-2024 में इसमें दस लाख की गिरावट आ गई । साल 2024-2025 में तो कुल 12 लाख 80 हजार आवेदन ही आए । ग्वालियर चंबल क्षेत्र में 63 फीसदी और मैदानी प्रशिक्षण में 80 फीसदी आवेदन कम आए । मुझे मिले इन नवयुवकों की मानें तो इसकी वजह कम वेतन, कठिन चयन प्रक्रिया और ऑन लाइन टैस्ट है । नवयुवकों को लगता है सरकार केवल पेंशन और दीर्घकालीन वित्तीय देनदारियों से बचने को यह योजना लाई है और इसके लिए देश की सुरक्षा की भी परवाह नहीं कर रही । अग्निवीर सैनिकों को उसी तरह के जटिल सैन्य अभियानों में शामिल किया जा रहा है जिसे नियमित सैनिक करते हैं। नतीजा नियमित फौजियों के अनुपात में अग्निवीर भी शहीद भी हो रहे हैं। यही कारण है कि पिछले तीन सालों में 20 अग्निवीर जवानों को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। विगत 25 जुलाई को ही जम्मू कश्मीर की एक बारूदी सुरंग में विस्फोट होने से मेरठ का अग्निवीर सैनिक ललित कुमार शहीद हो गया और उसके दो साथी बुरी तरह घायल हो गए । मिले युवकों में इस बात को लेकर बड़ा आक्रोश था कि शहीद हुए ललित कुमार के परिजनों को इंश्योरेंस और अनुग्रह राशि के अतिरिक्त केवल शहीद की रुकी हुई तनख्वाह ही मिलेगी । इन युवकों को यह भी कहना था कि गांव देहात में अग्निवीर सैनिक को वह सम्मान तो मिलता ही नहीं जो नियमित सैनिक को मिलता है, फौज में भी उसे दोयम दर्जे का माना जाता है। यही कारण है कि अब तक कई अग्निवीर आत्महत्या भी कर चुके हैं। मिले युवकों को इस बात पर बड़ी हैरानी थी कि चीन और पाकिस्तान जैसे कट्टर दुश्मनों से घिरे देश की सुरक्षा और जटिल सैन्य अभियान उन अग्निवीर सैनिकों के भरोसे सरकार छोड़ना चाह रही है जिन्हें मात्र छह महीने का प्रशिक्षण मिलता है।
उधर, अग्निवीर योजना को लेकर पिछले तीन सालों से देश में खूब राजनीतिक उठापटक भी हो रही है। कांग्रेस जैसी पार्टी ने तो 2024 के लोकसभा चुनावों में इसे अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था और वादा किया था कि यदि उनकी सरकार बनी तो यह योजना बंद कर देगी । कहा गया कि अग्निवीर का वेतन कई क्षेत्रों के न्यूनतम वेतन से भी कम है। सरकार के भीतर भी एक धड़ा इस योजना की मुखालफत कर रहा है। सरकार स्वयं भी समझ रही है कि योजना के परिणाम उतने सुखद दिखाई नहीं पड़ रहे, जितनी उम्मीद की गई थी । भारत पाकिस्तान के बीच हाल में हुए अल्प युद्ध और उसमें पाकिस्तान के पक्ष में चीन, तुर्किए और अजरबेजान जैसे देशों के खुल कर उतरने से भी बाह्य सुरक्षा का मामला अब बेहद संवेदनशील हो गया है। क्या ऐसे में सरकार को भी अग्निवीर जैसी असफल योजना पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए ? यदि कोई भूल हो गई है तो उसे सुधारने में काहे की शर्म ? लोकतन्त्र में तो ऐसा होता ही है। जनहित में कई बार फैसले वापिस लेने भी पड़ते हैं। हां यदि अपनी गलती न सुधारने की कोई जिद हो तो बात दूसरी है।