क्यों कमेटी

रवि अरोड़ा
दशकों पहले मैं एक बड़ी सामाजिक सांस्कृतिक संस्था का सदस्य था । संस्था की जब भी बैठक होती कुछ सदस्य खड़े हो जाते और हर बात पर तीखे सवाल करते कि ऐसा क्यों किया, ऐसा किससे पूछ कर किया वगैरह वगैरह । उनकी ‘क्यों” ‘क्यों’ इतनी थी कि मेरी मित्र मंडली ने उन लोगों का नाम रख दिया- क्यों कमेटी । तब से लेकर अब तक ज्यादा सवाल करने वालों को मैं भी ‘ क्यों कमेटी ‘ ही कहता हूं । हालांकि मेरा मानना है कि सवाल अच्छे होते हैं और बेहतरी के लिए सवाल किए ही जाने चाहिएं मगर हर बात में नुक्स निकालने की प्रवृति भी अच्छी नहीं होती । अब यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को ही लीजिए । इस मामले में सरकार से इतने सवाल किए जा रहे हैं कि चहुं ओर क्यों कमेटियां ही नजर आ रही हैं । हालांकि हमारी सरकार ने इस मामले में शुरुआती कोताही जरूर बरती मगर बाद में तो वह सक्रिय हो ही गई । यह भी ठीक है कि भारतीय छात्रों को यूक्रेन से निकालने का काम उतने बेहतर ढंग से भी नहीं हुआ जितना भक्त मंडली गुणगान कर रही है और अनेक सवाल अभी भी अनुत्तरीण ही हैं । वैसे यदि आप क्यों कमेटी के तमगे से मुझे न नवाजने का वादा करें तो मैं अवश्य इन पर बात करना चाहूंगा ।

पहली बात तो यही है कि विदेश में फंसे छात्रों को निकाल कर सरकार उनपर कोई अहसान नहीं कर रही क्योंकि यह उसका संवैधानिक कर्तव्य है । भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके नागरिकों को अपने जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी न केवल अपने देश में बल्कि विदेशों में भी मिली हुई है । दूसरी बात सरकार यह कार्य जनता से ही वसूले गए टैक्स से करती है और उसका इस कदर महिमा मंडन ठीक नहीं । कम से कम तब तक तो नहीं , जब तक एक एक छात्र वहां से वापिस घर नहीं लौट आता । सरकार यह कह देने भर से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती कि उसने समय रहते एडवाइजरी जारी कर दी थी कि छात्र यूक्रेन छोड़ दें । सरकार को बताना चाहिए कि एडवाजरी जारी करने के बाद उसने यूक्रेन से भारत आने वाली फ्लाइट्स में कितना इजाफा किया ? सरकार के मुखिया मोदी जी से यह सवाल भी बनता है कि जब तक बिलखते छात्रों के वीडियो घर घर तक नहीं पहुंच गए तब तक वे चुनावी रैलियों में ही क्यों लगे रहे और हजारों बच्चों के जीवन को खतरे में क्यों डाला ? आपरेशन गंगा को किस बिना पर रेस्क्यू ऑपरेशन कहा जा रहा है जबकि छात्रों को यूक्रेन से नहीं पडौसी देशों से लाया जा रहा है । जहां से तो वे खुद भी आ सकते हैं । रेस्क्यू तो तब होता जब यूक्रेन से बच्चों को लाया जाता । यूक्रेन से तो छात्रों को बंधक बनाने की खबरें आ रही हैं । माइनस तापमान में हजारों बच्चे भूखे प्यासे सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर यूक्रेन की सीमा तक कैसे पहुंचें यह सरकार क्यों नहीं बताती ? यह ठीक है कि कुछ छात्रों को सरकार घर वापिस ले आई है मगर क्या इसका इतना महिमा मंडन जरूरी है , वह भी उस देश में जो वर्ष 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान एक लाख सत्तर हजार लोगो को सकुशल घर वापिस लाने का रिकॉर्ड रखता है ? कितने छात्रों को वापिस वह ले आई है यह तो सरकार बता रही है मगर अभी कितने छात्र वहां फंसे हुए हैं , इसकी जानकारी सरकार क्यों नहीं दे रही ? ये सभी छात्र विधिवत पासपोर्ट और वीजा धारक हैं और उनका रिकार्ड विदेश मंत्रालय और स्थानीय एंबेसी के पास क्यों नहीं है ? वहां फंसे छात्र भारतीय दूतावास के असहयोग के वीडियो बार बार भेज रहे हैं , इस मामले में क्या किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई ? दावा किया जाता रहा है कि मोदी जी का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है , फिर क्यों भारतीय छात्रों को वहां से निकालने में रूस, यूक्रेन और पडौसी देश सहयोग नहीं कर रहे ? सवाल बहुत हैं मगर ज्यादा पूछ कर मैं क्यों कमेटी का सदस्य नहीं बनना चाहता। हालांकि मैं आश्वस्त तो अभी भी नहीं हूं कि आप मुझे यह तमगा नहीं देंगे ।

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