किसका मोहरा है अमृतपाल सिंह

रवि अरोड़ा
दुआ कीजिए कि जब आप यह पंक्तियां पढ़ रहे हों तब तक खालिस्तान आंदोलन का नया चेहरा बना अमृतपाल सिंह गिरफ्तार हो चुका हो। दुर्भाग्य से यदि ऐसा नहीं होता तो यकीन जानिएगा, यह संयोग नहीं वरन किसी न किसी प्रयोग का हिस्सा होगा । न जाने किसके इशारे पर अजनाला में पुलिस थाने पर हमला कर आधा दर्जन पुलिस कर्मियों को बुरी तरह घायल कर देने वाले इस अलगाव वादी को इतनी छूट मिल रही है ? उसकी हिम्मत तो देखिए कि वह अपनी जन सभाओं में भारत की एकता और अखंडता को तो चुनौती दे ही रहा है, साथ ही राज्य के मुख्यमंत्री व देश के गृह मंत्री को भी धमका रहा है ? क्या यह हैरानी का विषय नहीं है कि अजनाला कांड के एक महीने तक उस पर हाथ नहीं डाला गया और जब डाला तो वह चाक चौबंदी के तमाम दावों के बावजूद आसानी से फरार हो गया ? कहीं ऐसा तो नहीं कि आसन्न लोकसभा चुनावों तक जानबूझ कर देश पर उभरे इस छोटे से फोड़े को नासूर बनने दिया जा रहा हो और एन चुनावों से पहले कोई बड़ा आपरेशन कर चुनावी लाभ लेने की तैयारी हो ?

समझ नहीं आता कि छह महीने पहले तक जो पूरा सिख भी नहीं था और दुबई में अपना ट्रांसपोर्ट का धंधा कर रहा था , वह मात्र 29 साल का अमृतपाल सिंह कैसे आज खालिस्तानी मूवमेंट का सबसे बड़ा चेहरा हो गया और डुप्लीकेट भिंडरावाला बना घूम रहा है ? जिस दीप सिद्धू की संस्था ‘वारिस पंजाब दे’ पर उसने कब्जा कर अलग मुल्क की मांग उठाई है, वह तो खैर भाजपाई था और भाजपा सांसद सनी देओल का चुनाव प्रभारी भी रह चुका था मगर क्या अमृतपाल का भी कोई राजनीतिक कनेक्शन है ? बेशक सड़क दुर्घटना में दीप सिद्धू की मौत के बाद संगरूर के सांसद और अलगाववादी नेता सिमरन जीत सिंह मान ने अमृतपाल को बढ़ावा दिया मगर मान का कद तो इतना बड़ा नहीं है कि वह कोई नया भिंडरवाला तैयार कर सके ? तो क्या देश में फिर आठवें दशक जैसी किसी बड़ी आग से खेलने की तैयारी कोई कर रहा है ?

पता नहीं किस मुंह से पंजाब को अलग मुल्क बनाने की बात हो रही है जबकि वहां सिखों की आबादी 58 फीसदी ही है ? राज्य में 38 फीसदी हिंदू और और बाकी ईसाई और मुस्लिम हैं । क्या लगभग आधी इस गैर सिख आबादी को भी भारत से अलग किए जाने का कोई औचित्य ढूंढा जा सकता है ? उधर, सिख कौम पूरी दुनिया में छितरी हुई है। ब्रिटेन और कनाडा तो जैसे सिखो के दूसरे घर हैं, उनका क्या होगा ? पंजाब का आधे से अधिक बड़ा हिस्सा तो पाकिस्तान में है और जहां मात्र बीस हजार सिख हैं, क्या उसे भी खालिस्तान में शामिल किया जाएगा और भला कैसे ? भारत का कोई ऐसा राज्य नहीं जहां सिख न हों। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ही लगभग बीस लाख सिख हैं। दिल्ली की पांच फीसदी आबादी भी सिख है, उनके बाबत क्या सोचा है इन अलगाववादियों ने ? खालिस्तान की इस खुराफात से क्या उन्हें फिर 1984 की तरह बेहाल छोड़ दिया जाएगा ? दुनिया जानती है कि आज पंजाब बेरोजगारी और नशा खोरी की चपेट में है और वहां की लगभग तीन करोड़ आबादी को इससे बाहर निकालने की सख़्त आवश्यकता है मगर हमारे तमाम राजनीतिक दल इस छोटी समस्या से निपटने की बजाए उसके समक्ष बड़ी समस्या खड़ी कर लोगों का ध्यान भटकाने में ही लगे हैं । चार दशक पहले कांग्रेस ने कुछ इसी तरह की मंशा से भिंडरवाला पैदा किया था । इस बार भी खेल वही है । भिंडरवाला की जगह अमृतपाल सिंह है और कांग्रेस की जगह नया खिलाड़ी है ।

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