करतारपुर साहेब से लौट कर

रवि अरोड़ा
हालांकि करतारपुर कॉरीडोर को खुले हुए पूरे तीन साल हो चुके हैं मगर मैं अब कहीं जाकर पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहेब गुरुद्वारे के दर्शन कर पाया । बहुत गहरी इच्छा थी इस यात्रा पर जाने की मगर क्या करता कोरोना के चलते लगभग बीस महीने तो यह कॉरीडोर यूं भी बंद ही रहा और बाकी समय अपनी निजी समस्याओं से जूझने में व्यतीत हो गया। खास बात यह भी है कि मेरे बच्चे भी इस यात्रा के लिए लालायित थे। जब से उन्हें पता चला कि पाकिस्तान की इस यात्रा में पासपोर्ट पर इस पड़ौसी मुल्क की मुहर नहीं लगती तब से उनकी यह इच्छा और अधिक प्रबल हो गई। अब कौन नहीं जानता कि एक बार पाकिस्तान की मुहर पासपोर्ट पर लग जाए तो अमेरीका, आस्ट्रेलिया और यूरोप तो क्या छोटे मोटे देश भी अपने यहां आसानी से घूसने नहीं देते । हालांकि मैं और मेरे दोनो बच्चे धर्म कर्म में बहुत कमजोर हैं मगर पर्यटन को ही सही मगर हम धार्मिक स्थलों पर अकसर हो आते हैं। हां पत्नी यदि आज इस दुनिया में होती तो वह जरूर पूरे भक्ति भाव और श्रद्धा से करतारपुर के दर्शन करती । उसी का साथ निभाने को मैंने देश के अधिकांश धार्मिक स्थल देखे हैं। खैर, बात करतारपुर साहेब गुरूद्वारे की हो रही है तो अपने शब्द वहीं तक महदूद रखता हूं।
करतारपुर कॉरीडोर के मार्फत पाकिस्तान जाने को लेकर बड़ी आशंका थी कि पता नहीं अनुमति मिलेगी भी अथवा नहीं ? इस गुरूद्वारे में तो यूं भी पूरी दुनिया से सिक्ख आते होंगे और चूंकि हमने सबसे बडे़ त्यौहार दीपावली पर वहां जाना तय किया है तो पता नहीं कितनी भीड़ वहां मिलेगी ? भारतीय होने के नाते पाकिस्तानियों के व्यवहार को लेकर चिंता थी सो अलग। हालांकि उनके बाबत बहुत सारी जानकारी मैं पहले से जुटा कर गया था मगर फिर भी अपनी आंखों से जब तक देख न लो, किसी बात पर आसानी से विश्वास भी तो नहीं होता। बीस दिन पहले ऑन लाईन रजिस्ट्रेशन के बाद गृह मंत्रालय और स्थानीय खुफिया विभाग से प्रपत्रों की जांच तो करा ली थी मगर यात्रा से चार दिन पहले अनुमति पत्र जब तक नहीं मिला यह तय ही नहीं हो पाया कि इस बार हम दीपावली गुरुनानक की निर्वाण स्थली पर मना पाएंगे अथवा नहीं। वैसे तो भारत की सीमा से मात्र चार किलोमीटर दूर है करतारपुर का गुरुद्वारा दरबार साहेब मगर लगभग आधी सदी तक जैसे हमसे हजारों किलोमीटर दूर ही था । आजादी के बाद अधिकांश सिक्खों द्वारा हिन्दुस्तान के इस भू भाग में आकर बसने के निर्णय के बाद पश्चिमी पंजाब ( अब पाकिस्तान ) में रह गई मुठ्ठी भर सिख आबादी अपने गुरुद्वारों की ढंग से देखभाल भी तो नहीं कर पाई। सन 1947 से सन 2000 तक तो यह पवित्र स्थान बंद ही रहा और स्थानीय लोग अपने मवेशी यहां बांधते थे तथा गुरू घर की जमीन पर भी स्थानीय काश्तकारों का अवैध कब्जा था । साल 2004 से इसे भारतीय श्रद्धालुओं के लिए खोला गया और 2019 को कहीं जाकर इस कॉरिडोर से वीजा मुक्त आवाजाही का मार्ग खुला । कॉरीडोर हेतु भारतीय पक्ष में विकास कार्य का शिलान्यास करते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महती कार्य को जर्मनी को दो भागों में बांटने वाली बर्लिन की दीवार ढहाए जाने जितना महत्वपूर्ण बताया था । मगर यह सवाल मौजू है कि क्या वाकई भारत पाकिस्तान के बीच की कोई दीवार इस कॉरीडोर के बनने से ढही है ? क्या सचमुच इस कॉरीडोर से करतारपुर साहेब की यात्रा सुगम हुई है ? क्या वाकई भारत और पाकिस्तान की सरकारें चाहती हैं कि दोनो देशों के आम नागरिक एक दूसरे से निर्बाध तरीके से मिलें और यह कॉरीडोर दोनो देशों के बीच सौहार्द पैदा करने में सहायक हो ? ऐसे तमाम सवाल हैं जो बेलाग लम्बी चर्चा की मांग करते हैं ।
क्रमश:

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