एनिमल चैनल

रवि अरोड़ा
टीवी पर अक्सर एनिमल चैनल देखता हूँ । वहाँ जानवरों के जीवन के अतिरिक्त अनेक कार्यक्रम शिकार सम्बंधी भी होते हैं । शेर अथवा कोई हिंसक जानवर जब अपने किसी शिकार पर हमला करता है तो उस समय शिकार के साथी और सगे सम्बंधी दूर खड़े चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं । हिंसक जानवर जब अपने शिकार को नोंच रहा होता है , आश्चर्यजनक रूप से उस समय स्वयं शिकार भी ख़ामोशी से अपनी हत्या होते देखता रहता है और मुँह से कोई आवाज़ नहीं करता । कहावत है कि क़ुदरत की लाठी बेआवाज़ है । शायद यह बात सही भी हो मगर यह बात तो यक़ीनन दुरुस्त है कि निरीह की चीत्कार अवश्य ही बेआवाज़ है । उसके रुदन की कोई गूँज नहीं होती । उसकी आह भी ध्वनि रहित होती है । तथाकथित हमारे समाज के जंगल में विचरण कर रहे निम्न मध्यम और मध्यम मध्यम वर्ग के लोग भी मुझे उसी निरीह जैसे ही लगते हैं , जिनकी आह में कोई आवाज़ नहीं होती और बुरी तरह नुँच जाने के बावजूद वे ख़ामोश ही रहते हैं ।
एक पुराने कर्मचारी का सुबह फ़ोन आया । उसे अपने बैंक का एक मैसेज मिला था और उसी संदर्भ में वह जानना चाह रहा था कि क्या वाक़ई पिछले छः महीने से मिल रही किश्त जमा करने की बैंकों की छूट अब ख़त्म हो रही है ? बैंक का मैसेज तो हालाँकि यही है कि सभी प्रकार के लोन सम्बंधी मोरेटोरियम सुविधा अगस्त में ख़त्म हो रही है और पहली सितम्बर से सभी को बैंक की किश्त देनी पड़ेगी मगर फिर भी मैंने उसे तसल्ली दी कि अभी सरकार ने एसा कोई आदेश नहीं दिया है । हालाँकि मैं जानता हूँ कि अब मोरेटोरियम की सीमा बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है । सरकार और आरबीआई ने बड़े उद्योगपतियों के साथ सलाह मशविरा कर लगभग एसा मन बना लिया है । वैसे यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि देश में जिन दो करोड़ लोगों की नौकरी गई और जिन पाँच करोड़ से अधिक लोगों की तनख़्वाह अथवा काम धंधे की कमाई आधी रह गई , इस फ़ैसले में उनकी बजाय राय उद्योगपतियों से क्यों नहीं ली गई ? कोरोना संकट में बेशक करोड़ों लोगों की माली हालत पतली थी मगर फिर भी मकान की किश्त, कार-स्कूटर की किश्त, एजूकेशन लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड के भुगतान का कम से कम दबाव नहीं था अतः गाड़ी जैसे तैसे खिंच ही रही थी । बच्चों की स्कूल की फ़ीस और बिजली के बिलों को लेकर भी कोई विशेष संकट नहीं था मगर अब चहुँओर से दबाव शुरू हो गया है । करोड़ों लोगों की तीन चौथाई कमाई तो बच्चों की स्कूल फ़ीस और मकान-वाहन की किश्त में ही खप जाती है । क़ायदे से तो कोरोना का असली आर्थिक संकट अब पहली सितम्बर से उन्हें झेलना पड़ेगा । एविएशन, टूरिज़्म, हॉस्पिटैलिटी और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टर से जुड़े लाखों लोग तो शायद धराशायी ही हो जाएँगे ।
वर्ल्ड बैंक कह रहा है कि भारत में गम्भीर आर्थिक संकट है । आरबीआई कह रही है 2020-21 में जीडीपी नेगेटिव में रहेगी । सरकार ने अनेक योजनाओं की घोषणा भी की मगर बैंकों ने उसे पलीता दिखा दिया । बैंकों ने अपनी तरफ़ से इतनी शर्तें लगा दीं कि बीस फ़ीसदी सरकारी घोषणाओं पर भी अभी तक अमल नहीं हुआ । सरकार ने जो मोरेटोरियम की सुविधा दी उसे भी अब ब्याज सहित लोगों को चुकाना है । इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट भी तीखी प्रतिक्रिया दे चुका है । उधर अर्थशास्त्री बार बार एक ही बात कह रहे हैं कि इकोनोमी को बचाना है तो ग़रीब आदमी में हाथ में पैसा देना होगा मगर ग़रीब को पैसा मिलना तो दूर अब एक सितम्बर से उसकी जेब और ख़ाली करने की तैयारी है । उम्मीद थी कि कम से कम दिसम्बर तक किश्त जमा करने की छूट मिलेगी मगर एसा होता नहीं दिख रहा । कमाल की बात यह है कि इतना बड़ा फ़ैसला हो रहा है मगर कहीं कोई आवाज़ नहीं हो रही । किसी ग़रीब, किसी मध्यम वर्गीय आदमी की कोई आह सुनाई नहीं दे रही जबकि करोड़ों लोग अब इस परिस्थिति का शिकार होंगे । आइये आप भी इस एनिमल चैनल को देखिये और निरीह लोगों के यूँ ख़ामोशी से शिकार होने के गवाह बनिए ।

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