इतिहास की कुंज गलियों का भटकाव

रवि अरोड़ा
यूं ही खाली बैठा इतिहास की एक किताब टटोल रहा था । किताब में लिखा था कि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तक वाकई भारत सोने की ही चिड़िया था । यही नहीं सोलहवीं सदी के आस-पास भारत की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका, जापान, चीन और ब्रिटेन से भी अधिक थी । यानी सैंकड़ों वर्षों के मुगल एवम मुस्लिम आक्रमणकारियों के शासन के बाद भी विश्व की जीडीपी में भारतीय अर्थव्यवस्था की हिस्सेदारी सबसे अधिक थी । उधर, सत्रहवीं सदी में अंग्रेजों ने भारत पर कब्ज़ा किया और 1947 में अंगेज जब भारत को छोड़कर गए तब भारत का विश्व अर्थव्यवस्था में योगदान मात्र दो से तीन फीसदी ही रह गया था । बेशक मुगलों के शासन शुरू करने से पहले भी भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी मगर मुगलों के शासन यानी 1526-1793 के बीच भी भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1305 डॉलर थी जबकि इसी समय ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति जीडीपी 1137 डॉलर, अमेरिका की 897 डॉलर और चीन की 940 डॉलर थी । यही नहीं उस समय दुनिया की कुल आय में भी भारत की हिस्सेदारी 24.5% थी जो कि पूरे यूरोप की आय के बराबर थी । ये सारी जानकारियां आपसे सांझा करते समय मैं हैरान हूं कि आखिर क्या वजह है कि सत्ता पर काबिज़ लोगों की ज़बान पर आज सारी गालियां केवल मुस्लिम और मुगल शासकों के लिए ही आरक्षित हैं जबकि उनके शासन काल में भी भारत की हालत बेहतर बनी रही और भारत को सही मायने में नोंचने वाले अंग्रेजों के बाबत इनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुस्लिम हमलावरों ने भारत को जम कर लूटा और महमूद गजनी जैसे लुटेरे कई कई बार भारत को लूट कर ले गए मगर उस काल में तो यह पूरी दुनिया का चलन था । क्या अकेले भारत के साथ ही ऐसा हुआ था ? मुस्लिम हमलावरों के अतिरिक्त भारत को लूटने तो यूनानी, हूण , शक, कुषाण और न जाने कौन कौन आया । आधुनिक काल में भी डच , फ्रांसीसी, पुर्तगाली और अंग्रेज भी तो लूटपाट को ही आए थे। फिर सारा ज़हर मुस्लिम शासकों के हिस्से ही क्यों ? जबकि मुगल ही नहीं मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, लोधी , गुलाम, खिलजी जैसे वंश तो अपने आठ सौ साल के शासन में यहीं के होकर रह गए और भारत की संपदा बाहर भी नहीं ले गए । तो क्या कारण है कि सही मायनों में भारत को तबाह करने वालों की सही सही शिनाख्त हम नहीं कर रहे ?

माना मुस्लिम और मुगल शासकों ने मंदिर तोड़े और कई पर मस्जिदें तामीर करा दीं मगर ऐसा भी तो हमेशा से होता रहा है । अपनी शक्ति का एहसास कराने को हमारे हिंदू राजा भी तो दुश्मन हिंदू राजा के मंदिर तोड़ देते थे और उनकी मूर्तियां लूट लेते थे । सनातनी राजा पुष्पमित्र शुंग ने तो बौद्धों के 64 हजार स्तूप , शिलालेख और मठ तोड़े थे । बात कड़वी है मगर सच्चाई यही है कि सनातन धर्म में मंदिर और मूर्तियों का चलन तो बौद्ध और जैनियों की देखादेखी ही आया और हजारों की संख्या में मंदिर उनके धार्मिक स्थानों पर कब्जा करके ही बनने के आरोप लगते रहे हैं । जगन्नाथ मंदिर के पहले बौद्ध मंदिर , तिरुपति मंदिर के जैन मंदिर होने के प्रमाण समय समय पर सामने आते रहे हैं । बालाजी और सबरी माला जैसे सैंकड़ों मंदिरों की भी यही कहानी है । अब कहां कहां तक हम पीछे इतिहास में झांकेंगे, कहां कहां खुदाईयां कराएंगे ? आज हिन्दू अपनी मूर्तियां खोज रहे हैं , कल को जैन और बौद्ध यही मांग करेंगे । क्या पता मुस्लिम भी कोई नई कहानी निकाल लाएं । किस की मांग देश पूरी करेगा और क्यों करेगा ? वैसे भी यदि सारी मशक्कत इतिहास की कुंज गलियों की भटकन में ही करते रहेंगे तो भविष्य की बुलंद इमारत कब तामीर करेंगे ?

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