यादें

शर्मीली हैं मेरी यादें
नंग-धड़ंग आने से डरती हैं
मुझ तक
अदाएँ भी कुछ कम नहीं
ख़ुद से पहले भेजती हैं
फ़ुटनोट का हरकारा
खट्टा , मीठा , कड़वा
और दूसरे सभी स्वादों का फ़ुटनोट
हर याद पर चिपकी है
दुख या सुख की पर्ची
क्या करूँ
इन पर्चियों के पीछे
कहीं छुप सी जाती हैं
मेरी यादें
कभी कभी तो तरस ही जाता हूँ
साबुत यादों के दीदार को
….अच्छा सुनो
कल रात मैंने भी सीख लिया
यादों की पर्चियाँ बदलना
अब मैं भी दुःख की पर्चियाँ फाड़ कर
चिपका सकता हूँ
सुख की पर्ची
…सच
जीवन में तुम्हारे ना आने की याद
अब नहीं आएगी मुझ तक
दुख की टैगलाईन के साथ
चलो ख़ुश हो जाओ
तुम्हारी यादें अब
ख़ुशियाँ लेकर ही आएँगी
मेरे पास

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