तू है मेरी बेटी

तू ही

तू ही तू ही तू ही

मेरे जिस्म के बाहर मेरा जिस्म

मेरी रूह के बाहर मेरी रूह

मेरे कुल वजूद के बाहर मेरा वजूद

तू ही

तू ही तू ही तू ही

मुझ सी अक्खड़ मुझ सी अड़ियल

मुझ सी कोमल मुझ सी सख़्त

मुझ सी भावुक मुझ सी तुनक

तू ही

तू ही तू ही तू ही

मैं रूठता हूँ तुझसे तू होकर

तू रूठती है मुझसे मैं होकर

हम दोनो हैं तो है ये रूठना-मनाना

तू ही

तू ही तू ही तू ही

मैं ख़ुद को चाहता हूँ तुझे चाह कर

तू ख़ुद से ख़फ़ा होती है मुझसे ख़फ़ा होकर

इक दूजे से नहीं ख़ुद से ख़फ़ा होते हैं हम बार बार

तू ही

तू ही तू ही तू ही

मुझ से बेहतर मैं हूँ तू बन कर

मुझसे बेहतर सोचता हूँ मैं तू होकर

मुझ से बेहतर हूँ हर मानिंद मैं तू होकर

तू ही

तू ही तू ही तू ही

मैं चाहता था तुझ सा होना

मैं तुझ सा हुआ तू बन कर

तू मैं हूँ और मैं तू हूँ तू होकर

तू ही

तू ही तू ही तू ही

कायनात में गुम होकर भी रहूँगा मैं तू होकर

करूँगा बातें दुनिया से तू बन कर

मेरे होने का मार्फ़त ही तो होगा तेरा होना

तू ही

तू ही तू ही तू हीय

मैं दुनिया में रहूँगा सदा तुझे जीकर

तू सदा कायनात में होगी मैं होकर

हम दोनो का ही वजूद होगा हम होकर

तू ही

तू ही तू ही तू ही

-मैं हूँ तेरा पिता

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