रिजल्ट के बाद ध्यान रखिए कि क्या बोलते हैं डाॅ. मुरली मनोहर जोशी

रवि अरोड़ा

नई दिल्ली। भाजपा वाले दिल थाम कर बैठें। मार्गदर्शक मंडल में डाल दिए गए पार्टी के वरिष्ठ नेता आंख-कान खोले हैं। अभी उनके मुंह भले ही सिले लग रहे हों, पर वे इशारों-इशारों में बहुत कुछ कह रहे हैं।
भाजपा से जबरन रिटायर कर दिए गए डाॅ. मुरली मनोहर जोशी ऐसे ही नेताओं में हैं। जब पार्टी ने कानपुर से उनका टिकट काटा, तो उन्होंने अपनी सीट के लोगों को संबोधित पत्र में लिखा कि पार्टी महासचिव राम लाल ने उनसे कहा है कि मैं इस बार कानपुर या कहीं से भी चुनाव न लड़ूं। अभी मई के पहले सप्ताह में गाजियाबाद में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने इशारों-इशारों में ही सही, अपनी पार्टी की नीतियों पर कई सवाल खड़े किए। अवसर था पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी का। विषय थाः भारतीय समाज एवं संस्कृति के समक्ष चुनौतिया एवं समाधान।
डाॅ. जोशी को स्वागत भाषण एवं विषय प्रवर्तन करना था। वह समाज की चर्चा करते-करते राजकाज की भी चर्चा करने लगे। उन्होंने कहा कि जीडीपी के नाम पर समाज को भरमाया जा रहा है। उत्पादन बढ़ाने की अंधी दौड़ शुरू हो गई है और कोई नहीं देख रहा कि इसके लिए कच्चा माल कहां से आएगा। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन आखिर कहां जाकर ठहरेगा। मोदी सरकार के महत्वपूर्ण फैसले जीएसटी पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि अब तो लंगर पर भी टैक्स लग गया है और समाज की चिंता कहीं नहीं दिख रही। खेती-किसानी घाटे का सौदा है और पता नहीं, किसान क्यों खेती कर रहा है? क्या किसान ने हमारा ठेका ले रखा है?
डाॅ. जोशी ने केंद्र सरकार द्वारा निर्मल एवं अविरल गंगा के दावे को भी आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि आज गंगा मर रही है। गंगा को अब दुनिया की दस प्रदूषित नदियों में शुमार कर लिया गया है। नदियों को आपस में जोड़ने के मुद्दे पर उन्होंने टिप्पणी की कि नदियों में पानी ही नहीं है तो नदियों को जोड़ने का क्या लाभ? उन्होंने श्रोताओं से सवाल किया कि क्या दस भिखारी मिलकर एक धनवान बन सकता है? इस कार्यक्रम की खास बात यह भी रही कि राजनीतिक चर्चाओं से बचने वाले पुरी के शंकराचार्य भी डाॅ. जोशी के दर्द में शामिल हो गए और उन्होंने कहा कि बेहतर समाज के लिए अभिवादनशील व्यक्ति का अभिवादन आवश्यक है।
कभी पार्टी अध्यक्ष रहे डाॅ. जोशी को पार्टी ने इस बार स्टार प्रचारकों की सूची में भी शामिल नहीं किया। कानपुर, वाराणसी और प्रयागराज-जैसे उन क्षेत्रों में भी उन्हें जनसभाओं से दूर रखा गया जहां से वह सांसद रह चुके हैं। वह पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के बाद पार्टी में दूसरे वरिष्ठतम नेता हैं, फिर भी अब उनकी तस्वीर भी कहीं नहीं लगाई जाती।

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