2माहौल फिर गर्म है

रवि अरोड़ा

घर में पेंटर काम कर रहा था । नाम था मदन लाल । उम्र में मुझसे बेहद छोटा होने के बावजूद मैं उसका नाम नहीं ले पाता था । क्या करता , मेरे पिता का नाम भी तो यही है । अब कोई अपने पिता का नाम यूँ ही बार बार कैसे ले ? शायद यही वजह रही होगी कि मदन लाल पाहवा का नाम भी बचपन में मुझे अपना सा लगता था । वही मदन लाल पाहवा जिसे महात्मा गांधी हत्याकांड में आजीवन कारावास हुआ था । वही पाहवा जिसने नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या से दस दिन पूर्व उनकी प्रार्थना सभा में बम फेंका था और रंगे हाथ पकड़ा भी गया था । आज जब साध्वी प्रज्ञा द्वारा ठाकुर द्वारा संसद में गोडसे को देशभक्त बताये जाने पर हंगामा मचा हुआ है , मुझे मदन लाल पाहवा बरबस याद आता है । गांधी जी की हत्या में शामिल बेशक सभी लोग मराठी थे मगर मुंबई निवासी होने के बावजूद पाहवा मेरी बिरादरी का ही तो था और संयोग से पंजाब के उसी ज़िला मोंटगोमरी का मूल निवासी था , जहाँ कभी मेरे पूर्वज रहा करते थे । पाहवा का नाम बचपन में जब पहली बार सुना था तब उसे भगत सिंह और ऊधम सिंह जैसा बताया गया था । बताने वाले अपने ही थे और उन दिनो बँटवारे का दंश भूलने की जुगत में थे । बँटवारे के समय हुए सदी के सबसे बड़े दंगे के लिए उन्हें समझाया गया था कि गांधी और कांग्रेस ही इसके दोषी हैं । उनका यह कहना भी सच जान पड़ता था कि गांधी की बात पत्थर की लकीर होती थी और जब गांधी जी ने कहा कि बँटवारा मेरी लाश पर होगा तो पंजाबियों ने यक़ीन कर लिया था कि बँटवारा नहीं होगा । नतीजा जब बँटवारा हुआ तो उन्हें रातों रात सबकुछ छोड़ कर घरों से भागना पड़ा । शायद यही वजह होगी कि गांधी की हत्या में शामिल मदन लाल पाहवा उन्हें अपना सा लगा और कुछ समय के लिए ही सही मगर उसे अपना हीरो उन्होंने मान लिया ।

बँटवारे के बाद दिल्ली और उत्तरी भारत में बसे तमाम पंजाबी आरएसएस को अपना सबसे बड़ा ख़ैरख्वाह मानते रहे । उनका मानना था कि उन्हें फिर से बसाने में संघ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी और उसी के फलस्वरूप उन्होंने संघ की विचारधारा और उससे जुड़े राजनीतिक दल जनसंघ और बाद में भाजपा का दामन कभी नहीं छोड़ा । संघ ने भी राष्ट्रीय स्तर पर जनसंघ व भाजपा का नेतृत्व करने के लिए विस्थापित लाल कृष्ण आडवाणी व दिल्ली की बागडोर विजय कुमार मल्होत्रा , केदार नाथ साहनी और मदन लाल खुराना जैसे विस्थापित परिवारों से आये युवाओं को सौंपी । हालाँकि कांग्रेस ने भी पंजाबियों को गले लगाया और हरकिशन लाल भगत और जगदीश टाइटलर को आगे लाये मगर संघ जैसी बात पंजाबियों में कांग्रेस की कभी नहीं बनी । विचार के स्तर पर चीज़ें कैसे काम करती हैं , यह उसका बड़ा उदाहरण है । ख़ैर बात फिर पाहवा की करता हूँ । गांधी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सज़ा भुगतने के बाद रिहा होने पर वह मुम्बई में ही बस गया और सन 2000 में गुमनाम मौत मरा । वह नेवी से रिटायर होकर एक पटाखा फ़ैक्ट्री में काम करता था और वहीं बम बनाते हुए उसके एक हाथ की उँगलियाँ उड़ गईं थीं। बम बनाने के उसके हुनर को पहचान कर ही उसे हिंदू महासभा वालों ने गले लगा लिया और बँटवारे के लिये गांधी को दोषी बता कर उनकी हत्या के लिये तैयार किया । इस बाबत उसने प्रयास भी किया मगर पकड़ा गया ।

संसद में प्रज्ञा ठाकुर द्वारा गोडसे को देशभक्त बताने वाले बयान पर मुआफ़ी माँगने से बेशक मामले का पटाक्षेप हो गया लगता है मगर एसा हुआ नहीं है । सोशल मीडिया पर गोडसे को महान बताने वाले संदेशों की इनदिनो बाढ़ सी दिखाई पड़ रही है । आज की युवा पीढ़ी जो इतिहास नहीं जानती और जिसे भारत की आज़ादी में गांधी जी की भूमिका का नहीं पता , वह सच में अपने मन मस्तिष्क में गोडसे को गांधी के मुक़ाबिल खड़ा देख रही है । देश के राजनीतिक वातावरण में यूँ भी गांधी के नामलेवा कम होते जा रहे हैं और गोडसेवादियों की हनक चहुँओर सुनाई पड़ रही है । इस माहौल में न जाने कितने नये गोडसे पैदा होंगे और न जाने कितने मदन लाल पाहवा अपने दुःखों की मरहम तलाशते हुए उनमे आ मिलेंगे ? बेशक मैं पाहवा को भटका हुआ युवा कहने की गुस्ताखी नहीं कर रहा मगर उसे भटकाने वालों के हुनर की तो बात कर ही सकता हूँ । सुन रहे हो न आज के मदन लाल पाहवाओं मैं तुमसे बात कर रहा हूँ ? देख लो माहौल फिर गर्म है ।

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