हे ईश्वर अब तू ही इन्हें समझा

रवि अरोड़ा
अब इसे आप संस्कार कहें अथवा परिवार का माहौल मगर यह सत्य है कि देश के अधिकांश धार्मिक स्थल पर मैं माथा टेक आया हूँ । इस मामले में मैंने मंदिर, गुरुद्वारे , चर्च और दरगाहें सब जगह समभाव से शीश नवाया । यदि सच कहूँ तो हमारे देश के धार्मिक स्थलों पर जाकर आप कुछ और पायें अथवा नहीं मगर थोड़ी देर को ही सही मगर अपने अहंकार से तो बरी हो ही जाते हैं । जी नहीं मैं आध्यात्मिकता के परिप्रेक्ष्य में यह नहीं कह रहा । मैं तो पीछे खड़ी बेतहाशा भीड़ और आराध्य देव के सामने पहुँचने पर पंडे-पुजारी द्वारा ख़ुद को आगे ठेले जाने के बाबत बात कर रहा हूँ । अक्सर एसा हुआ है कि ढंग से मूर्ति को देख भी नहीं पाये और किसी ने धकिया कर आगे बढ़ा दिया । अब मामला भगवान के दरबार का होता है सो अहंकार का सवाल ही नहीं , मान-अपमान का कोई मुद्दा ही नहीं , बस यही संतोष रहता है कि चलो जैसे तैसे दर्शन तो हो ही गए । उधर, सभी धार्मिक स्थलों पर एक ख़ास बात मुझे दिखी । अपने मोहल्ले के मंदिर-गुरुद्वारे में जो लोग खरीज चढ़ाते हैं , वहाँ बड़े बड़े नोट निकालते हैं । नोटों वाले सोने का कोई उपहार अपने इष्ट देवता के लिए लाते हैं । धार्मिक स्थलों के संचालक भी हमारे इस मनोभाव को समझते हैं और भगवान और हमारे बीच में पहले से हो बड़ी गुल्लक रख देते हैं । पहले पैसे डालो फिर दर्शन करो । हम भी इस व्यवस्था को समझते हैं अतः धार्मिक स्थल के गर्भ गृह पहुँचने से पहले ही चढ़ावे के पैसे तैयार रखते हैं । अब इष्ट देव के सामने पहुँचने पर इतना समय आपको कौन देगा कि आप जेब से अपना पर्स निकाल सकें ।
कई बार हिसाब लगाता हूँ कि इन धार्मिक स्थलों पर साफ़-सफ़ाई से लेकर अन्य छोटे बड़े सभी काम तो भक्तगण निशुल्क स्वयं ही कर देते हैं , फिर इतने चढ़ावे की ज़रूरत ही क्या है ? बेशक एसा कोई रिकार्ड नहीं है , जिससे पता चले कि देश में कुल कितने धार्मिक स्थल हैं मगर एक अनुमान लगाया जाता है कि इनकी संख्या पंद्रह लाख से अधिक होगी । अब यह अंदाज़ा तो क़तई नहीं लगाया जा सकता कि इन स्थलों पर प्रतिदिन कितना चढ़ावा चढ़ता होगा मगर इतना तो तय है कि यह राशि सैंकड़ों करोड़ रुपए तो अवश्य ही होती होगी । अख़बारों में अक्सर एसी रिपोर्ट छपती भी रही हैं कि देश के प्रमुख सौ मंदिरों का सालाना चढ़ावा देश के सालाना योजना बजट से अधिक होता है । कहते हैं कि पद्मनाथ स्वामी मंदिर, तिरुपति बालाजी, शिर्डी , सिद्धिविनायक, गोल्डन टेंपल , वैष्णोदेवी और गुरुवयूर जैसे प्रमुख मंदिर-गुरुद्वारों के तहखानों अथवा बैंक एकाउंट्स में इतनी दौलत है कि यदि सारी सरकार को मिल जाए तो देश बैठे बैठाये ही सोने की चिड़िया बन जाए । वैसे हमारी इस विसंगति पर पूरी दुनिया भी हैरान ही होती है कि धरती का हर चौथा ग़रीब जिस देश में रहता हो , वहाँ के धार्मिक स्थलों के पास इतनी दौलत है ? हालाँकि वे जब हमारा इतिहास पढ़ते होंगे और उन्हें पता चलता होगा कि मोहम्मद गजनी ने सत्रह बार भारत पर हमला देशवासियों को नहीं सोमनाथ मंदिर को लूटने के लिए किया था , तो उन्हें हमारे समृद्ध मंदिरों के बाबत सहज विश्वास हो ही जाता होगा । मंदिर ही क्यों हमारे हज़ारों की संख्या में धर्मगुरु क्या कम अमीर हैं ? सत्य साईं बाबा और जय गुरुदेव की सम्पत्ति उनके देहांत के बाद आँकी गई तो पचास पचास हज़ार करोड़ रुपये निकली । राधा स्वामी जैसे पचासों एसे बाबा देश में हैं जिन्होंने अपने पूरे पूरे शहर बसा रखे हैं । कमाल है कि कोरोना वायरस के आतंक के इस माहौल में भी किसी ने अभी तक अपने खीसे से इक्कनी भी नहीं निकाली ? कमाल यह भी है कि तंगी और बेपनाह ख़र्चों के बावजूद सरकार भी इन पर हाथ डालने का साहस नहीं दिखा रही । हे ईश्वर अब तू ही इन धर्मगुरुओं और मंदिरों के मठाधीशों को इतनी सदबुद्धि दे कि वे लोग यह सारा धन जनता के दुःख दर्द बाँटने में ख़र्च करें । हे ईश्वर इन्हें बता कि धन के इस उपयोग से तुझे ही सबसे अधिक ख़ुशी होगी ।

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