विधवा के दुश्मन हज़ार
रवि अरोड़ा
कहते हैं कि समय का पहिया केवल आगे की ओर ही बढ़ता है मगर अब इस बात पर शक होने लगा है । चारों और निगाह दौड़ाइए समय के रथ पर सवार हम हिंदुस्तानी तो पीछे लौटने को ही बेताब नज़र आते हैं । मुल्क की गाड़ी भी बैक गेयर जैसी घुर्र घुर्र करती दिखाई दे रही है। और यह सब हो रहा है उस धर्म और जाति के नाम पर, जिसकी प्रासंगिकता दुनिया भर में शनै शनै समाप्त होती जा रही है । गौर से देखिए, मुल्क में हर ओर ज़हालत परंपरा का चोला पहन कर नग्न नाच रही है और हम हैं कि इस पर बलिहारी जाए जा रहे हैं। इटावा में गैर ब्राह्मण कथावाचकों के साथ जो किया गया , क्या यह घटना कहीं से भी 21वीं सदी की आपको लगती है ? ऐसा तो मध्य युग में भी शायद न होता होगा । अपने से कथित नीची जाति को अपने मूत्र से पवित्र करने की खबर अपने जीवनकाल में कहां हमने इससे पहले कभी देखी सुनी थी ? माना उत्तर प्रदेश जातिगत दलदल में सर्वाधिक गहराई तक धंसा हुआ है मगर अब ऐसा क्या हुआ है कि आए दिन ऐसी खबरें सामने आ रही हैं ? विगत कुछ महीने में ही मथुरा और मेरठ में दलित दूल्हे के घोड़ी पर सवार होने पर बारात पर हमला , महोबा में रैदास जयंती पर निकाली जा रही शोभायात्रा पर बवाल, सहारनपुर में दलित की हत्या, प्रताप गढ़ और प्रयागराज में दलित नेताओं से हिंसा और बुलंद शहर और मथुरा में भी यही सब कुछ । यह सब उसी जाति के नाम पर जो न जाने क्यों आज भी हमारी पहचान का एकमात्र जरिया बनी हुई है ? गांवों में जातियों की अलग अलग बस्तियां, एक दूसरे का सामाजिक बहिष्कार और जातिगत वैमनस्य क्या पहले भी इतना ही था ?
कहते हैं कि पाखंड की सबसे बड़ी निशानी यही है कि वह तार्किकता से खार खाता है। भागवत कथा कहने पर जिन यादव कथावाचकों के बाल मुड़वाए गए । पेशाब से शुद्ध किया गया । वे उन्हीं श्री कृष्ण की कथा कहने ही तो गए थे जो उसके सजातीय थे । बेशक महापुरुषों और देवी देवताओं की कोई जाति अथवा संप्रदाय नहीं होता मगर जिन्हें सिर्फ जाति और धर्म ही समझ में आता है उन्हें तो बताना ही पड़ेगा कि जिसने भागवत कथा लिखी वह वेद व्यास एक मल्लाह स्त्री सत्यवती की संतान थे । हिंदू धर्म में निर्विवादित रूप से पहले दो कथावाचक वाल्मीकि और वेद व्यास माने गए । एक ने रामायण लिखी और दूसरे ने महाभारत । उनकी जातियों के बारे में क्या कहीं कोई संदेह है ? हमारे तमाम देवी देवताओं की जातियां भी बतानी पड़ेंगी क्या ?
आजकल शहर शहर गली गली कथाएं कहने सुनने का चलन है। न जाने कितने कथावाचक धर्मगुरु बन गए हैं। हाल ही में सम्पन्न हुए कुंभ में देश की लगभग आधी हिन्दू आबादी गंगा में डुबकी लगा आई । करोड़ों लोग राम मंदिर और काशी विश्वनाथ हो आए । लाखों लोग कुछ दिनों बाद कांवड़ लेने गंगा चले जाएंगे । जहां देखो वहीं धार्मिकता की बयार है मगर क्या हमारा यह धर्म कर्म हमें कुछ भी नहीं सिखा पा रहा ? जो धर्म हमें कायदे का इंसान ही नहीं बना पा रहा तो इसके अतिरिक्त हमारे जीवन में और क्या योगदान हो सकता है उसका ? हमसे से तो दुनिया की वह एक तिहाई नास्तिक आबादी अच्छी जो हर सुख सुविधा का लाभ ले रही है और एक अच्छे इंसान के कर्तव्य से भी विचलित नहीं हो रही । क्या हम यह साबित करने पर तुले हुए हैं कि जहां जहां धर्म है, वहीं वहीं ज़हालत है ? ज़हालत को अपने धर्म से जोड़ कर दिखाने की यह हमारी कैसी जिद है ?
ब्रिटिश काल के हिंदुस्तान को छोड़ कर आज लगभग पूरी दुनिया जाति प्रथा से बाहर आ चुकी है। पिछली सदी में जापान और कोरिया , जहां इसकी जड़ें हमसे भी गहरी थीं, ने भी इससे मुक्ति पा ली और विकास की राह पर सरपट दौड़ पड़े। अफ्रीका के कुछ देश अभी भी हमारी तरह जातीय जकड़न में कैद हैं और नतीजा हमारी तरह ही कष्ट पा रहे हैं। यूरोप और अमेरिका ने भी चर्च के चंगुल से अपने को आजाद कर विज्ञान के साथ कदम ताल करना उचित समझा। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे हमारे पुराने हिस्से को छोड़ दें तो दुनिया के तमाम इस्लामिक देश भी कट्टरता से बाहर आने को बेताब नज़र आ रहे हैं मगर हाय रे हम भारतीय ! हमें तो बस यही कट्टरता और ज़हालत सुहा रही है । कहते हैं कि विधवा के दुश्मन हज़ार । यही हाल हमारा है। हम इस ज़हालत से बाहर आना भी चाहें तो हमारे राजनीतिक दल हमें ऐसा करने नहीं देते । किसी ने कोई धर्म पकड़ रखा है तो किसी ने कोई जाति । उसकी हर बात की ठेकेदारी भी उन्हीं के पास है। तभी तो देखिए कि ब्राह्मण वोटों के लालच में भाजपा कथावाचक कांड की सीधे सीधे निंदा नहीं कर रही और यादव जाति के व्यक्ति पीड़ित हैं तो समाजवादी पार्टी अपनी पूंछ में आग लगाए घूम रही है।