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मसला-ए-कश्मीर

रवि अरोड़ा

कश्मीर में पैदल मार्च कर रहे सीआरपीएफ के जवानों के साथ अभद्रता का वीडियो देख कर बहुत ग़ुस्सा आया । सच कहूँ तो ख़ून ही खौल गया । फिर एक और वीडियो अवतरित हुआ जिसने पत्थरबाज़ों से अपनी सुरक्षा को फ़ौजी अपनी जीप के आगे एक पत्थरबाज़ को बाँध कर ले जा रहे हैं । धुर मानवतावादी होने के बावजूद यह वीडीयो मुझे राहत भरा ही लगा और मुँह से अनायास निकला- वाट एन आइडिया सर जी । फिर मैंने ख़ुद से ही सवाल किया कि ये यह जीप कश्मीर को कहाँ ले जाएगी ? इस पत्थरबाज़ युवक को तो थोड़ी देर बाद फ़ौज ने मुक्त कर ही दिया होगा मगर इन हालात से कश्मीर कब मुक्त होगा ? आख़िर कहाँ जा रहा है कश्मीर ? क्या कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं है ? क्या केंद्र की एनडीए सरकार कांग्रेस की पिछली सरकार से भी गई गुज़री है ? दशकों तक धारा 370 के मुद्दे पर दहाड़ने वाली भाजपा अब सत्तासुख में इतनी कमज़ोर क्यों हो गई कि मामूली उपद्रवियों के समक्ष भी मिमियाने लगी और हमारे बहादुर जवानों को सरेआम अपमानित होना पड़ रहा है अथवा अमानवीय क़दम उठाने पड़ रहे हैं ?

समझ नहीं आ रहा कि श्रीनगर में उपचुनाव कराने की एसी क्या जल्दी चुनाव आयोग और सरकार को थी जो देश-दुनिया में अपनी भद्द पिटवा ली । नौ अप्रैल को हुए इस उपचुनाव में आठ लोग मारे गए और 150 घायल हो गए। कुल 120 पोलिंग बूथ लूट लिए गए और दो स्कूलों में आग लगा दी गई । उसपर भी मतदान हुआ केवल सात फ़ीसदी । बाद में 38 बूथों पर पुनर्मतदान में तो और दुर्गति हुई और केवल दो फ़ीसदी लोगों ने वोट डाले । पिछले तीस सालों में सबसे कम मतदान का रिकोर्ड भी इसी उपचुनाव में दर्ज हुआ । केंद्र की एनडीए और राज्य की भाजपा-पीडीपी गठबंधन वाली सरकार एक साथ कई मोर्चों पर विफल हुई और रही सही कसर अब फ़ौजियों को लात मारते उपद्रवियों के विडियो ने पूरी कर दी । फ़ौजी देश की रक्षा करते हैं मगर उनके मान-सम्मान की रक्षा कौन करेगा ? वीडियो में साफ़ दिखाई दे रहा है कि फ़ौजियों के हाथ ऊपरी आदेशों से बँधे हुए थे वरना वह यदि हवाई फ़ायर भी कर देते तो उपद्रवी तुरंत अपनी बिलों में छुप जाते ।

समझ से परे है कि केंद्र सरकार की कश्मीर नीति आख़िर है क्या ? पिछले तीन सालों में उसने कश्मीर के हालात सुधारने को एक भी क़दम क्यों नहीं उठाया ? धारा 370 लागू होने के बाद से ही इस मुद्दे पर राजनीति करने वाली भाजपा अब क्यों ख़ामोश है ? केंद्र में सरकार बनते ही धारा 370 हटाने की बात करने वाले अब तो राज्य सरकार में भी भागीदार हैं , अब उन्हें क्यों लकवा मार गया ? धारा 370 हटाना तो दूर अब तो संसद में इसपर चर्चा भी वे नहीं करा रहे । आख़िर एसी क्या राजनीतिक मजबूरी है कि उसने सत्ता की अपनी भागीदार पीडीपी को लिखित आश्वासन दे दिया कि धारा 370 के मामले में उनकी सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी ?

2011 की जनगणना बताती है कि कश्मीर में युवाओं का औसत पूरे देश में सर्वाधिक है । ज़ाहिर है कि युवाओं की बड़ी आबादी को काम धंधा भी चाहिए । मगर हमारी सरकारें इसमें विफल रही हैं और इसी का फ़ायदा उठा कर पाकिस्तान नित नया प्रपंच करता है । पैसे देकर बेरोज़गार युवाओं से पत्थरबाज़ी कराना उसका नया पैंतरा है । नोटबंदी के तुरंत बाद पत्थरबाज़ी बंद हो गई थी । सरकार ने इसका श्रेय भी ख़ूब लिया मगर बाज़ार में नए नोट आते ही उपद्रव फिर शुरू हो गए । सरकार भी मान रही है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकी वट्सएप से पत्थरबाजों के गिरोह चला रहे हैं मगर उनके ख़िलाफ़ वह कुछ कर नहीं रही । कोई इनसे पूछे तो सही सैनिकों का अपमान करा कर कश्मीर समस्या हल हो जाएगी क्या ? केवल एक सर्जिकल स्ट्राइक से बात बन जाएगी क्या ? आख़री सवाल- सिर्फ़ एक बार श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फैहराना ही काफ़ी है क्या ? क्या सचमुच ?

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