लुकिंग बैक

रवि अरोड़ा

वयोवृद्ध चाची जी बेहद बीमार हैं । लगभग नब्बे वर्षीय पिताजी के साथ उनकी तबीयत की ख़बर लेने अस्पताल गया था । एक हफ़्ते की बीमारी में वे ढंग से हिलडुल भी नहीं पा रही थीं मगर पिताजी यानि अपने जेठ को आता देख चाचीजी ने फटाफट बिस्तर में कहीं पड़ी अपनी चुन्नी ढूँढी और झटपट सिर पर पल्लू कर लिया । पिताजी पास पहुँचे तो चाचीजी ने जितना उठ सकीं उतना उठकर उन्हें पैरीपौना भी किया । अस्सी पार की चाची जी द्वारा नई नवेली दुल्हन की तरह किया गया यह व्यवहार मेरे लिए नया नहीं था मगर इस स्थिति में भी वे इस रवायत या यूँ कहिये कि संस्कार का पालन करेंगी , मुझे इसकी कतई उम्मीद नहीं थी । चाची जी का यह व्यवहार मुझे लुकिंग बैक मोड में ले गया और छोटे-बड़े के सत्कार अथवा आदर से जुड़ी बीते दिनो की कई बातें याद आने लगीं । हालाँकि अधिकांश रवायतों का मैं क़तई हिमायती नहीं हूँ और शुक्र करता हूँ कि हमारा समाज अब उनसे लगभग बाहर आ गया है मगर न जाने क्यों आज भी वह बातें भूलती नहीं हैं ।

लगभग पचास साल पुरानी बात होगी । मई-जून का महीना था । भरी दुपहरी में कई किलोमीटर साइकिल चला कर ताऊजी जब हमारे घर पहुँचे तो उन्हें पता चला कि पिताजी घर पर नहीं हैं । घर के मुख्य द्वार के उसपार खड़े ताऊजी और दरवाज़े की ओट में सकुचाई सी छुपी मेरी माँ में जो संक्षिप्त वार्ता हुई वह आज भी ज़ेहन में ताज़ा है । दोनो लोगों ने आपस में सीधी बात न कर मेरा सहारा लिया था । उन दिनो मेरी माँ क्या , अन्य सभी औरतें भी अपने ससुर और जेठ से एसे ही बातें करती थीं । ताऊ जी ने कहा-काका मम्मी से पूछ तेरे डैडी कब आएँगे । चूँकि दोनो कुछ फ़ीट की दूरी पर ही खड़े थे अतः मुझे सवाल दोहराने की आवश्यकता नहीं थी । माँ ने जवाब दिया-काका कह दे कि वे बता कर नहीं गए । माँ ने कहा-काका ताऊजी से कह अंदर आ जायें और पानी पी लें । इस पर ताऊ जी बोले-पुत्तर मम्मी से कह दे कि मैं पानी पी कर आया हूँ…बेटा मम्मी से कह दे कि तेरे डैडी आयें तो बता देंगी कि मैं आया था । और इस प्रकार भीषण गर्मी में ताऊजी बिना पानी पिये ही वापिस कई किलोमीटर साईकिल चला कर लौट गये ।

मेरे बचपन का ही एक क़िस्सा और है । नाना जी हमारे यहाँ दो तीन दिन के लिए रहने आये । चूँकि बेटी के घर का पानी भी पीना उन्हें गवारा नहीं था अतः घर के पास के एक हैंडपंप से उनके लिए मैं पानी लाता था । पंजाब में नाना जी के जिले लायलपुर के ही एक साहब पड़ौस में रहते थे । इस नाते वे उनके बेटे जैसे हुए अतः खाना और चाय उनके घर से आती थी । चलते समय पड़ौसी की पत्नी , जो अब उनकी बहु थी , को अच्छा ख़ासा शगुन भी नाना जी ने दिया ।

मेरे पुराने मौहल्ले में मेरी कई मौसियाँ, चाचियाँ और कई बुआएँ थीं । रिश्तों का निर्धारण उम्र , जाति अथवा क्षेत्र से बड़ी आसानी से हो जाता था । भोजन के समय पड़ौस के किसी के भी घर जा कर कुछ खा लो । महिलाओं में सब्ज़ी और पकवान का आदान-प्रदान इतनी तेज़ी से होता था कि पता ही नहीं चलता था कि अपने घर की सब्ज़ी कौन सी है और पड़ौस की कौन सी । बुड्ढा किसी घर का मरे , मोहल्ले की तमाम औरतें एक जैसे ही विलाप करती थीं । शादी किसी घर में हो , चूल्हा न्योत तो सबका होता ही था । बेशक मैं अतीतवादी नहीं हूँ और लुकिंग बैक मोड में जाना क़तई पसंद नहीं करता मगर अब जब अपने इर्दगिर्द नई पीढ़ी को नमस्ते करने से भी बचते देखता हूँ तो पुराना ज़माना याद आता ही है ।

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