लालटेन वाले शायर

रवि अरोड़ा
कालेज के ज़माने से ही मुझे शेरो शायरी का ऐसा चस्का लगा कि आज तक नहीं छूटा । हालाँकि मैं ख़ुद कभी शेर नहीं कहता मगर तमाम छोटे-बड़े शायरों के सैंकड़ों शेर ज़ुबानी याद हैं । पता नहीं क्यों दशकों से कवितायें लिखते रहने के बावजूद शेरों शायरी के मुक़ाबिल मुझे कवितायें और गीत कहीं ठहरते नहीं दिखते । इंसानी दिमाग़ की शायद ही कोई ऐसी ख़लिश होगी जिस पर हज़ारों हज़ार शेर न कहे गये होंगे । अब मुझे नहीं पता कि शेर का मूल विचार समाज में पहले जन्मता है अथवा शायर के दिमाग़ में , मगर उस विचार को सीना दर सीना आगे बढ़ाने में तो यक़ीनन शायर का ही कमाल होता है । हाँ शेरों शायरी और उसके विचार को लेकर पसंदगी-नापसंदगी ज़रूर निजी हो सकती है । हो सकता है कि किसी को शराब, हुस्नो इश्क़ और माशूक़ की नज़ाकत पर कहे शेर पसंद आते हों तो कोई खुदा की शान में कही गई गहरी बातों को ही शेर समझता हो । अदब की दुनिया के चाहने वाले ऐसे भी बहुत है जो जन सरोकारों की शायरी के अतिरिक्त अन्य शायरी को क़तई महत्व नहीं देते । संक्षेप में कहूँ तो मूलतः दो तरह की शायरी और शायर नज़र आते हैं , एक सपना देखने वाले और दूसरे हक़ीक़त बयान करने वाले । एक प्रेमी तो दूसरे विद्रोही ।

ख़ुद को किसी खेमे में न मानते हुए यदि निरपेक्ष भाव बात करूँ तो सैकड़ों साल से हमारे समाज के मूल ख़याल शेरो शायरी में बयाँ होते नज़र आते है । ग़ालिब, मीर, जौक़, फ़ैज़, ज़फ़र, फ़िराक़ और मोमिन जैसे शायर तो अपने वक़्त के इंसानों के ख़यालों को हूबहू बंदिशों में उतारने का कमाल करते ही नज़र आते हैं । हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन, दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है , कह कर ग़ालिब तमाम धार्मिक मान्यताओं पर उठे वक्ती सवाल कर बैठते हैं तो और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा ..कह कर फ़ैज़ इंसानी ख़्वाबों को ज़मीनी हक़ीक़त पर उतार लाते हैं । 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता ज़फ़र के शेर दो गज़ ज़मीं भी न मिली क़ूए यार में नुमायाँ होती है तो आज़ादी के आंदोलन को हितैषी का शेर शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले अगुवाई करता है । दुष्यंत छद्म लोकतंत्र पर यह कह कर सवाल करते हैं कि कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिये, कहाँ मयस्सर नहीं चराग़ सारे शहर के लिए तो लोकतंत्र के नाम पर हो रही खुली लूट को अदम गोंडवी यह कह कर शब्द देते हैं- काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में, उतरा है रामराज विधायक निवास में । उधर मुल्क के अल्पसंख्यकों के भावों को राहत इंदोरी के ये शब्द सटीक प्रतिनिधित्व करते हैं कि किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है ।

समाचारों में आए दिन देखने को मिल रहा है कि अपनी फ़सल का उचित मूल्य न मिलने से ख़फ़ा किसान अपनी फ़सलों को जला रहे हैं । बेशक ऐसा ज़माने से होता आया है मगर अब किसान यह काम निराशा और हताशा में नहीं वरन आक्रोश में कर रहे हैं । दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन से भी कुछ ऐसी ही अपील किसानों से की जा रही है । अजब इत्तेफ़ाक है कि कुछ ऐसा ही महान शायर अलामा इक़बाल लगभग अस्सी साल पहले अपने इस शेर में कह गये थे-जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी ,उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो । कमाल है लिखे हुए शब्द सदियों बाद भी ज़िंदा रहते हैं और यदि रदीफ़ क़ाफ़िये और बहर का ख़याल रख शेर के रूप में कहे जायें तो शायद अमर ही हो जाते हैं और समाज को दिशा भी दिखाते रहते हैं । शेरो शायरी समाज की दिशा तय करे यह बात कुछ लोगों को पसंद नहीं आती और वे उसकी राह में काँटे भी बिछाते रहते हैं मगर समाज की दशा बताने से तो शायर को नहीं रोका जा सकता न । चलिए फ़िल्वक्त दशा बताने वालों से ही काम चलाते हैं दिशा बताने वाले भी देर सवेर सामने ज़रूर आएँगे । हाथ में लालटेन लिये ।

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