रास्ता रोकने वाले

रवि अरोड़ा

बुज़ुर्ग एक क़िस्सा सुनाया करते हैं । उस दौर में जब ख़तों-खिताबत का माध्यम मुंडी भाषा थी और चिट्ठी-पत्री के अलावा संचार का कोई अन्य साधन भी नहीं था , उन दिनो एक चिट्ठी ने कोहराम ही मचा दिया। परदेस गए एक व्यापारी ने अपने घर मुंडी में लिख कर चिट्ठी भेजी- बड़ी बही भर गई है , छोटी बही भेज दो । शब्दों का हेरफेर एसा हुआ कि घर वालों ने मज़मून को कुछ यूँ पढ़ा- बड़ी बहू मर गई है , छोटी बहू भेज दो । अर्थ के होते अनर्थ से जुड़े और हँसने-हँसाने को गढ़े गए इन तरह के तमाम क़िस्सों में इस सत्य के दर्शन भी होते हैं कि लिखे हुए शब्द सदैव वह अर्थ लिए हुए नहीं होते , जैसा कि हम उन्हें समझते हैं । आज के दौर में जब सौ-पचास साल पुराने इतिहास को भी हम लोग नहीं बक्श रहे और अपने मन माफ़िक़ उनके अर्थ निकाल रहे हैं तब कैसे यक़ीन करें कि सैंकड़ों-हज़ारों साल पहले लिखे गए धर्म ग्रंथों के मूल अर्थ हमने सुरक्षित छोड़े होंगे ? आज के तमाम धार्मिक झगड़ों और विवादों के पीछे भी कहीं अर्थों को अनर्थ करने की हमारी यही प्रवृति तो नहीं ?

हरिद्वार में हमारे ख़ानदानी पुरोहित के यहाँ मेरे पूर्वजों का ब्योरा पहले मुंडी फिर गुरमुखी और बाद में उर्दू और अब हिंदी में लिखा हुआ बहियों में नज़र आता है । यक़ीनन इसकी शुरुआत संस्कृत से हुई होगी और कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य में इसे अंग्रेज़ी में लिखा जाएगा । चार जमात पढ़ा हुआ होने के बावजूद इनमे से कई भाषायें मैं नहीं जानता सो जो पुरोहित जी बता दें , उसे ही सत्य के रूप में स्वीकार करना पड़ता है । जानकार बताते हैं कि दुनिया भर में लगभग छः हज़ार भाषायें हैं । हिब्रू जैसी भाषा तो तीन हज़ार साल पुरानी है । हमारे अपने मुल्क में साढ़े तीन हज़ार साल से संस्कृत का प्रयोग हो रहा है और हमारे अधिकांश धर्मग्रंथ संस्कृत में ही नजर आते हैं । ढाई हज़ार साल पहले महात्मा बुद्ध ने पाली और लगभग इतने ही वर्ष पूर्व भगवान महावीर ने प्राकृत भाषा में अपने धर्म संदेश लिखवाए । पिछले एक हज़ार सालों में हिंदीतर भाषाएँ जैसे तमिल, उड़िया , बांग्ला , मराठी , सिंधी , गुजराती , असमिया और पंजाबी में भी ईश्वरीय फ़रमान लिखे गए । किस भाषा को कौन कितना समझता है , यह भी संशय का विषय है । दुनिया के अन्य मुल्कों की भी यही दास्तान है । ईसाई , यहूदी , मुस्लिम , चीनी लोक , शिन्तो , बहाई , कायो दाई , चेनेदो और तेनरिक्यो जैसे धर्मों ने भी अपने दौर की भाषाओं में ईश्वर , मनुष्य और कायनात की व्याख्या की। अब किसने क्या लिखा है और सचमुच लिखा भी गया था अथवा हमने अपने हितों के मद्देनज़र उन्हें जोड़ दिया , यह किसी को नहीं मालूम । ग्रंथों में लिखे गए ईश्वरीय संदेशों का क्रम क्या है और किस संदर्भ में क्या कहा गया , यह भी हमें नहीं पता । क्या सचमुच धर्म के नाम पर संगठन खड़ा करना भर ही उनके रचियताओं का उद्देश्य रहा होगा या हमने ही उनके नाम का बेजा इस्तेमाल किया ? क्या सचमुच बाइबिल और क़ुरान विस्तारवादी संदेश देते हैं या अपने साम्राज्य को बढ़ाने के उद्देश्य से उस दौर के बादशाहों ने इनकी आढ़ में दुनिया भर में ख़ून ख़राबा किया ? क्या हमारे ग्रंथों में सचमुच लिखा है कि वेद का कोई शब्द शूध्र के कान में पड़ जाए तो उसके कानों में पिघला सीसा घोल देना चाहिए अथवा सामंतवादी ताक़तों ने वेदों के नाम पर हमें बाँटा ? किस धर्म का नाम

लें , किस ग्रंथ की बात करें ? सभी तो अपने व्याख्याकारों के शिकार नजर आते हैं ।अजब माहौल है । साहित्य इतिहास मान लिए गया और इतिहास साहित्य सा धूल फाँक रहा है । धर्म ग्रंथ अंतिम सत्य बताए जाते हैं और उनके व्याख्याकार ईश्वरीय दूत । सब कुछ हम अपनी सुविधा और लाभ की नज़र से कर रहे हैं । एसे में इंसानियत आगे बढ़े भी तो कैसे ? रास्ता रोकने वाले भी तो हज़ार हैं ।

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