राम राम बनाम जय श्रीराम

रवि अरोड़ा

हाल ही में नौ दिसम्बर की बात है । दिल्ली से एक मित्र का फ़ोन आया और अभिवादन के तौर पर गर्वीली आवाज़ में वह बोला-जय श्रीराम । जवाब में मैंने भी कह दिया- राम राम । यूँ भी अभिवादन के तौर पर नमस्ते अथवा नमस्कार के बजाय मैं राम राम ही कहना पसंद करता हूँ । इस पर मित्र आवेश में आ गया और बोला राम राम नहीं , बोलो जय श्रीराम । इस पर मैंने पूछा- विहिप की धर्म सभा से लौटे हो क्या ? जवाब में मित्र आग बबूला ही हो गया और बोला-क्यों कोई पाप है क्या ? वह यहीं नहीं रुका और उसने राम मंदिर , हिंदू-मुस्लिम , तुष्टिकरण , नेहरू , कम्यूनिस्टों और न जाने कौन कौन से विषय पर आधे घंटे का मुझे वट्सएपिया ज्ञान पिलाया और आख़िर में बोला-अब कहो जय श्री राम । मगर मैं भी पूरा ढीठ और मैंने फिर कह दिया-राम राम । इस बार निराश मित्र ने चुप्पी साध ली और मौक़ा ताड़ कर इस बार माइक मैंने संभाल लिया और धारा प्रवाह अपनी सोच टेबल पर रख दी । वैसे मैं नहीं जानता था कि एसी स्थिति होगी। मैं उसके लिए तैयार भी नहीं था मगर जो मुँह में आया वह कह ज़रूर दिया । मैं बिना किसी विराम के बोला भाई राम राम और जय श्री राम में बहुत फ़र्क़ है । आपके राम राजनीतिक हैं और मेरे धार्मिक । मैं राम राम अभिवादन के तौर पर कहता हूँ और आप जय श्रीराम किसी उद्घोष के रूप में । आपका जय श्री राम सामने वाले के प्रति आपका सत्कार और आपका निजी संस्कार नहीं वरन कोई उन्माद दर्शाता है । आपका जय श्री राम मुझ जैसे उन करोड़ों लोगों को माफ़िक़ नहीं आता क्योंकि हम जानते हैं कि वह हमारे आपसी राम रमैया से नफ़रत करता है । आख़िर कहाँ से लाए आप यह जय श्रीराम ? रामायण और राम चरित मानस जैसी राम कथाओं में तो यह कहीं नहीं है ? गोस्वामी तुलसी दास तो मानस में जय सिया राम कहते हैं या सिया वर राम अथवा कहीं कहीं राजा राम । वाल्मीकि भी रामायण में सिर्फ़ राम शब्द का इस्तेमाल करते हैं । फिर कहाँ से लाए आप यह जय श्रीराम ? कहीं रामानंद सागर के टीवी धारावाहिक रामायण से तो उधार नहीं लिया आपने यह जय श्री राम ? उसी में तो युद्ध के समय हनुमान और पूरी वानर सेना अपने साथियों में जोश का संचार करने के लिए बार बार जय श्री राम कहती है । वैसे धारावाहिक में भी सामान्य स्थिति में हनुमान आदि भी प्रभु राम ही कहते हैं । तो क्या आप लोग किसी युद्ध को छेड़े हुए हैं और अपने लोगों में जोश का संचार करने के लिए जय श्री राम-जय श्री राम कहते हैं और अपने इसी शब्द से मुझ जैसे साधारण लोगों का साथ आने के लिए आह्वान करते हैं ? भाई मेरे राम तो वाल्मीकि और तुलसी दास वाले हैं । मैं उन राम को जानता और मानता हूँ जो दशरथ पुत्र राम पर ही नहीं थमते और घट घट में व्याप्त हैं । वह राम जिन्हें कबीर भी मानते हैं और नानक भी । स्वामी रामानन्द , नाभा दास , अग्रदास, केशव और सेनापति जैसे सैंकड़ों भक्तों ने जिनकी शान में हज़ारों रचनाएँ लिखीं । भाई तुम्हारे राम वे हैं जिनके नाम पर दंगे कराये जाते हैं । चुनाव लड़े जाते हैं । वैमनस्यता व्याप्त की जाती है । तुम्हारे लिए राम एक राजनीतिक हथियार हैं । कथित अपने लोगों को उकसाने का ज़रिया हैं । जबकि मेरे राम वह हैं जो आज भी अनजान आदमी के समक्ष भी हाथ उठा कर मुँह से झरते हैं । और सामने वाला भी उतने ही प्यार से कहता है- राम राम जी । लगातार बोलते रहने पर मैंने ध्यान दिया कि उधर से मित्र हाँ अथवा न कुछ भी नहीं कह रहा है । मैंने हेलो हेलो कहा तब भी उधर से कोई जवाब नहीं आया । दरअसल मित्र ने फ़ोन काट दिया था । शायद मेरी कोई बात उसने सुनी ही नहीं और मेरे बोलने से पहले ही लाइन डिसकनेक्ट कर दी थी । अब मित्र ने मेरी कोई बात नहीं सुनी तो मैंने सोचा कि क्यों न आपको ही सारी बात कह दूँ । आप भी तो मेरे मित्र हैं ।

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