राम-रमैया दुआ-सलाम

रवि अरोड़ा

मेरठ से लौटते हुए हाईवे पर भयंकर जाम मिला । जल्दी घर पहुँचने के लिए एक छोटी सड़क पकड़ ली । भोजपुर से आगे दत्तैड़ी नाम के गाँव के पास पहुँचा तो वहाँ भी जाम मिला । पता चला कि यहाँ इन दिनो सालाना जाहर वीर मेला लगा हुआ है । न जाने क्या सोचकर गाड़ी से उतरा और मेले में चला गया । इस देहाती मेले में भी वही सब कुछ पाया जो अन्य मेलों में होता है यानि दुकानें , झूले , खेल-तमाशे और खाना-पीना । मेले में आये लोगों के चेहरों पर उत्साह और आनंद की चिरपरिचित चमक थी । चिरपरिचित इस लिए कि रामलीलाओं के दिनों में मेला देखते समय मेरे और आपके चेहरे पर भी यही चमक तो होती है। देश का कोई छोर ही होगा जहाँ कोस दो कोस पर कोई मेला लगता हो । अब लगे भी क्यों न , मेलों और त्यौहारों में ही तो भारतीयता बसती है ।

किशोरावस्था में मेरठ के नौचंदी मेले में जाते थे । रात भर घूमते-फिरते थे और चौबीस घंटे खुले रहने वाले सिनेमाघरों में सुबह छः बजे का शो देख कर ही लौटते थे । ख़ैर जाहरवीर मेले से लौटते समय मैंने स्वयं अपने आप से पूछा कि एसा क्या था जो मुझे इस मेले में ले गया ? इन मेलों में एसा क्या होता है जो सारा साल हम अपने क्षेत्र में लगने वाले किसी मेले का इंतज़ार करते हैं ? आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में जहाँ बहुत कुछ पीछे छूट गया है , एसे में ये मेले क्यों हमारे हाथ से नहीं फिसले ?

भारत में मेले कब से शुरू हुए कोई नहीं जानता । इतिहास की नज़र से देखें तो छठी सदी में भारत आए चीनी यात्री ह्वान संग ने सबसे पहले इसका ज़िक्र किया । वैसे पुराणों की बात करें तो कुम्भ को भारत ही नहीं दुनिया का पहला मेला करेंगे । कहा जाता है कि समुंद्र मंथन से निकले अमृत कलश यानि कुम्भ को लेकर देवताओं और असुरों में जब छीना झपटी हुई तब अमृत की कुछ बूँदें प्रयाग , हरिद्वार , उज्जैन और नासिक में गिरीं थीं । चूँकि देवताओं और असुरों के बीच युद्ध पूरे बारह दिन चला था और धरती का एक वर्ष देवलोक के एक दिन के बराबर होता अतः हर बारह वर्ष के बाद बारी बारी से इन तीर्थस्थानों पर कुम्भ का मेला लगता है । कहा तो यह भी जाता है कि कुम्भ के मेले भी बारह ही होते हैं और चार धरती पर व शेष आठ देवलोक में लगते हैं । यानि मेले देवताओं के मन को भी भाते हैं । एसा नहीं है कि भारत का केवल कुम्भ ही विश्व प्रसिद्ध है । राजस्थान का पुष्कर , बिहार का सोनपुर , उड़ीसा का चंद्रभागा , पश्चिमी बंगाल का गंगा सागर , असम का अम्बूवामी और लद्दाख़ का हेमिस गोंपा मेला देखने भी दुनिया भर से लोग पहुँचते हैं । बैसाखी , ओणम , दुर्गा पूजा , गणेश पूजा जन्माष्टमी और बसंत पंचमी जैसे अवसरों पर भी ये मेले सामाजिक समरसता , खेल प्रतियोगिताओं , भाईचारा और मेलजोल का पैग़ाम लेकर आते हैं । पीरों-फ़क़ीरों की मज़ारों पर लगने वाले उर्स और ईद पर सजने वाले क्षेत्रीय बाज़ार भी दरअसल मेले ही हैं । धार्मिक अथवा सांस्कृतिक ही नहीं मुल्क में कृषक व पशु मेले भी ख़ूब लगते हैं । बेशक मेलों पर अब बाज़ारवाद हावी हो गया है और आर्थिक चक्र को तेज़ी से घुमाने का काम ये मेले अब अधिक करने लगे हैं मगर इन मेलों में आज भी बहुत कुछ है जो सदियों पुराना है और शाश्वत है ।

रामलीलाएँ शुरू होने वाली हैं और उसमें लगने वाला मेला देखने इस बार भी आप मेरी तरह अवश्य जाएँगे । वहाँ घूमते-फिरते और लोगों से दुआ सलाम करते हुए स्वयं से यह सवाल आप अवश्य कीजिएगा कि हमारे पूर्वजों ने ये मेले ठेले आख़िर शुरू क्यों किए होंगे ? क्या प्यार-मोहब्बत , आपसी भाईचारा , मेलजोल और अधिक से अधिक लोगों से राम-रमैया अथवा दुआ सलाम को ही ये मेले लगाए अथवा उनका कोई और मक़सद भी रहा होगा ? यदि मेरी तरह आप भी कोई और मक़सद न ढूँढ सकें तो इस बार मेले में जम कर लोगों से राम रमैया दुआ सलाम कीजिएगा । यही तो हमारी संस्कृति की मूल गंगा है जो अविरल बह रही है । और देखिये न कि तमाम बुरी निगाहों के बावजूद यह निर्बाध ही तो है ।

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