राम नाम सत्य है

रवि अरोड़ा

एक मित्र की माता जी का देहांत हो गया । अंतिम संस्कार के लिए शव को लेकर हम लोग हिंडन नदी स्थित श्मशान घाट जा रहे थे । जहाँ जहाँ से होकर अंतिम यात्रा गुज़रती , एक अजीब सी हलचल वहाँ दिखाई देती । जो भी शव को देखता हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता । कार स्कूटर वाले भी अपना वाहन रोक कर हाथ जोड़ देते । कोई हाथ जोड़ने के साथ साथ कानो को भी हाथ लगाता । अनेक लोग तो चार कदम साथ भी चल देते , जैसे प्रतीकात्मक रूप से शव यात्रा में शामिल होने का अपना फ़र्ज़ पूरा कर रहे हों । दिवंगत आत्मा के प्रति सम्मान का माहौल हर ओर बिखरा दिखा । दुःख के माहौल में भी संतोष का भाव चेहरे पर पसर गया । एक अजीब सी प्रसन्नता भी महसूस की कि कितनी महान संस्कृति है हमारी । कितना सम्मान देते हैं हम दुनिया से जाने वाले को । किस सम्मान से हम उसे दुनिया से विदा करते हैं । अंतिम यात्रा के प्रति यह सत्कार बचपन से मैं देख रहा हूँ और इसमें कभी भी कुछ अनोखा नहीं लगा मगर उस दिन एक विसंगति के रूप में भी यह दिखा । लगा कि काश जीवित लोगों के प्रति भी हम इतना आदर-सम्मान अपने दिलों में बचा कर रख पाते ।

सर्दियाँ चरम पर हैं । मुल्क में अनगिनत लोग बिना छत के रहते हैं । मेरे अपने शहर में भी हाड़ कंपा देने वाली इस सर्दी में हज़ारों लोग खुले में सोते हैं । किसी का इनकी ओर ध्यान नहीं जाता । सर्दियों में फ़ैशन शो की तरह ग़रीबों को कम्बल बाँटने का तमाशा होता है । एक आदमी पर कम्बल डालते हुए दस दस आदमी मिल कर फ़ोटो खिंचवाते हैं और फ़ेसबुक पर अपनी वाहवाही ख़ुद ही करते हैं । पता नहीं ये लोग एक के अलावा दूसरा कम्बल बाँटते भी हैं या नहीं ? कई शहरों में मुफ़्त खाना बँटता है । आयोजकों की गाड़ी पहुँचने से पहले ही लम्बी लम्बी लाइनें लग जाती हैं । साफ़ है कि भूखे ज़्यादा हैं और उन पर तरस खाने वाले कम । मेरे मोहल्ले के मंदिर के बाहर मंगलवार को पचास से अधिक बच्चे एकत्र हो जाते हैं । मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के बाद भक्तगण गुलदाने के चार-छः दाने उन्हें भी दे देते हैं, जिन्हें वे अपनी झोली में जमा करते रहते हैं । कोई बता रहा था कि यह प्रसाद दोबारा हलवाई के पास पहुँच जाता है । शायद एसा हो भी । मगर हिसाब लगायें तो इन बच्चों की दस-बीस रुपये से अधिक कमाई नहीं होती होगी । हो सकता है किसी को यह भक्तों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नज़र आता हो मगर यह खिलवाड़ वही तो कर रहा होगा जिसके पास शायद कोई और विकल्प भी न हो ।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने हाल ही देश को बताया है कि मुल्क में हर साल डेड लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं । उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक बीस हज़ार से अधिक मौतें इन हादसों में होती हैं । अधिकांश मौतें समय से इलाज न मिलने के कारण होती हैं । दुर्घटनाग्रस्त लोगों की मदद करने का चलन समाज में ख़त्म सा होता जा रहा है । पुलिस के पचड़े से बचने को लोगबाग़ शायद एसा करते हैं । हालाँकि अब सभी प्रदेशों की सरकारें आश्वासन दे रही हैं कि घायल को अस्पताल पहुँचाने वाले से पूछताछ नहीं की जाएगी मगर फिर भी लोग बाग़ अपना फ़र्ज़ नहीं निभा रहे । एक अमानवीय चलन और शुरू हो गया है और अनेक लोग दुर्घटना की अपने फ़ोन से वीडियो बनाने लगते हैं । ठीक है कि आए दिन हो रहे हादसों ने हमारी संवेदनाओं को कुन्द किया है और अब हम किसी के दुःख-दर्द से आसानी से विचलित नहीं होते। फिर हम शव यात्रा को देख कर हाथ जोड़ने का ड्रामा क्यों करते हैं ? किसे बेवक़ूफ़ बनाते हैं ? समाज को , ऊपर वाले को या ख़ुद अपने आप को ? अब जिसे मर्ज़ी बेवक़ूफ़ बना लें , मौत को नहीं बना पाएँगे और जिस दिन वो आएगी दूसरे लोग भी हमारी तरह तमाशा देखेंगे और वीडियो बनाएँगे ।

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