राम जाने

रवि अरोड़ा

लीजिए रिलीज़ होने से पहले ही पद्मावत फ़िल्म को लेकर बवाल शुरू हो गया । सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई सम्मान नहीं , सरकारी संस्था सेंसर बोर्ड की स्वीकृति के कोई मायने नहीं । लोगों की जातिगत , सांस्कृतिक और कथित इतिहास के प्रति श्रद्धा इतनी नाज़ुक हो गई कि एक फ़िल्म से ही संकट में आ गई । वैसे इस फ़िल्म के रिलीज़ होने का सभी को इंतज़ार है । दर्शकों से अधिक ख़ुराफ़ाती बेताब हैं । कोई बड़ी बात नहीं कि आप जब यह फ़िल्म देख रहे हों , उस समय सिनेमाघर के बाहर कोई प्रदर्शन भी हो रहा हो । पुलिस-प्रशासन ने ढील दी तो शायद तोड़फ़ोड़ भी हो जाए । मलिक मोहम्मद जायसी की एक साहित्यिक रचना पर आधारित इस फ़िल्म को लेकर उठा तूफ़ान हैरान कर देने वाला है । हैरानी की वजह फ़िल्म का विरोध नहीं वरन आज का यह दौर है , जब छोटी छोटी बात पर हंगामा हो जाता है । अपनी संस्कृति को जाने बिना उसपर मर मिटने वाले शोहदे गली गली तैयार हो रहे हैं ।

हैरानी इस बात पर भी होती है कि अपने दौर के हमारे समाज सुधारक संत और भक्त कवि कबीर , नानक , बुल्ले शाह , बाबा फ़रीद , रैदास , तुकाराम और रसखान जैसे लोग कितने साहसी रहे होंगे ? उस काल में जब शिक्षा का प्रसार नहीं था , धार्मिक संगठनों का बोलबाला था, जातिगत विषमताएँ चरम पर थीं और राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियाँ विपरीत थीं , उस दौर में कैसे इतनी साहसिक बातें वे लोग कह पाए ? आज का वक़्त होता तो शायद कबीर जैसे लोग जेल में होते । बाबा नानक और बुल्ले शाह के ख़िलाफ़ रोज़ प्रदर्शन हो रहे होते । मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण भक्ति के गीत लिखने पर रसखान और जायसी जैसों के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी हो चुके होते । कोई बड़ी बात नहीं कि आधे से अधिक ये समाज सुधारक देशद्रोही घोषित कर दिए जाते और उनके ख़िलाफ़ पुलिस थानों में आए दिन झूठे मुक़दमे दर्ज हो रहे होते ।

स्कूली पढ़ाई में ही सही , कबीर को हम सबने थोड़ा बहुत पढ़ा है । बाबा नानक , फ़रीद और बुल्ले शाह के शबद गुरुद्वारों और सूफ़ी संगीत के माध्यम से हम तक पहुँचते ही रहते हैं । मीर-ग़ालिब के शेर बच्चे बच्चे को याद हैं । स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश हर आर्य समाजी के घर मिल जाएगी । ज़रा ग़ौर से इन सबको देखिएगा और सोचिएगा कि क्या आज कोई एसा कह सकता है ? अजान को मुर्ग़े की बाँग और खुदा के बहरे होने की बात क्या अब कही जा सकती है ? क्या कोई बुल्ला अब अपनी जाति के अभिमान में चूर ऊँची जातियों की तुलना कुत्ते से कर सकता है ? क्या अपने पैरों की दिशा में काबे को घुमा देने की नसीहत नानक जैसा कोई फ़क़ीर अब दे पाएगा ? मुस्लिम होकर हिंदू को गुरु के रूप में स्वीकार करने वाले कबीर क्या आज जीवित रह सकते हैं ? क्या कोई रसखान , अब्दुल सत्तार , जायसी जैसा कवि अब मुस्लिम होते हुए कृष्ण भक्ति के गीत गा सकता है ? क्या क़ुरान और बाइबिल की बातों को कोई दयानंद खुलेआम चुनौती दे सकता है ? क्या आज कोई ग़ालिब आशंका व्यक्त कर सकता है की काबे का पर्दा ना उठाओ कि कहीं वहाँ भी काफ़िर सनम ना हो ? अदम गोंडवी जिस जाति की गलियों में हमें ले चलने की बात करते हैं , वह शब्द कह सुनकर क्या कोई आज हरिजन एक्ट से बच सकता है ? अकबर इलाहबादी और नज़ीर अकबराबादी की तरह साम्प्रदायिक और सामाजिक समरसता के गीत लिखने वाले लोग यदि होते तो अब किस हाल में होते ? ज़रा सोचिए सोशल मीडिया पर चल रही नफ़रत की आँधियों में इन पीर-फ़क़ीरों , शायरों और इन भक्त कवियों की आवाज़ क्या हम तक पहुँच पाती ? क्या वाक़ई आज की सरकारें उन्हें बर्दाश्त कर पातीं और उनपर तरह तरह के प्रतिबंध लगाने के बाबत नहीं सोचतीं ?

विडम्बना देखिए कि जैसे जैसे ज़रूरत बढ़ रही है वैसे वैसे धर्मनिरपेक्षता व सहिष्णुता जैसे शब्द अपनी धार खोते जा रहे हैं । इन शब्दों का ज़िक्र करते ही एक ख़ास राजनीतिक सोच के लोग हमलावर हो जाते हैं । उन हमलों के तूफ़ान में असल मुद्दा फिर कहीं खो जाता है । पद्मावत को लेकर भी अब वही होने जा रहा है । समझ की होती जा रही नाज़ुक मिज़ाजी की बात कोई नहीं करेगा । इस पर कोई बात नहीं होगी कि हमारी असली सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत क्या है ? कहानियों और किस्सागोई में रमे हम अपनी नाक पर मक्खी भी ना बैठने देने के भाव में आते जा रहे हैं जबकि हमारे जख़्म खुले पड़े हैं और वहाँ कीड़े रेंग रहे हैं। राम जाने क्या होगा हमारा । सचमुच राम ही जाने ।

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