राग पद्मावती

रवि अरोड़ा

हालाँकि मैं भी मानता हूँ कि पद्मावती जैसे मुद्दों पर बहस फजूल है और एसा करना असली मुद्दों से भटकना होता है । मगर क्या करें अब ज़बरन इसे मुद्दा बना ही दिया गया है तो बात करनी ही पड़ेगी । सच कहूँ तो फ़िल्म पद्मावती को लेकर मैं भी ख़ुश नहीं हूँ । वैसे मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ज़बरदस्त पक्षधर हूँ मगर संजय लीला भंसाली की इस फ़िल्म का प्लॉट मुझे भी जमा नहीं । मेरी नाख़ुशी फ़िल्म में अलाउद्दीन ख़िलजी और पद्मावती के कथित प्रेम प्रसंग को लेकर नहीं वरन इस फ़िल्म के बहाने मुल्क की सामाजिक समरसता के दुश्मनों को एक और बहाना देने को लेकर है । सारी दुनिया जानती है कि रानी पद्मावती की एतिहासिकता का कोई प्रमाण नहीं है । पन्द्रहवीं सदी के महान भक्त कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने महाकाव्य पद्मावत में पहली बार पद्मावती का ज़िक्र किया था। उन्ही के अनुसार वर्ष 1303 में सिंहल द्वीप यानि श्रीलंका की राजकुमारी पद्मावती ने चित्तौड़ में अपने पति रावल रतनसेन की युद्ध में मौत के बाद जौहर किया था । विडम्बना देखिए कि सामंती परम्पराओं और उसी से गढ़े गए नैतिक मूल्यों द्वारा हज़ारों स्त्रियों की सामूहिक आत्महत्या को जौहर का नाम दिया गया । सती प्रथा के नाम पर महिलाओं को पति के साथ जान देने के लिए उकसाने अथवा मजबूर करने वाला समाज एसी आत्महत्याओं को ही युगों तक महिमामंडित करता रहा और कमोवेश आज भी किसी ना किसी रूप में कर रहा है । पद्मावती के पात्र के बहाने अपना गौरव तलाश रहा हमारा समाज प्रथ्वीराज चौहान का भी सही इतिहास जानने की बजाय चंद बरदाई रचित पृथ्वीराज रासो महाकाव्य को ही इतिहास मान रहा है । किस किस का नाम गिनायें काल्पनिक कहानियों और इतिहास के घालमेल की एसी पंचमेल खिचड़ी हमने पकाई है कि सत्य कहीं मुँह छुपाते बैठा है । वैसे कई बार लगता है कि कोई समाज जो हज़ारों साल तक फजूल के आपसी झगड़ों , विदेशी और आताताइयों के हमलों से लुटता पिटता रहा हो उसे अपना मन बहलाने को साहित्य में ही सही गौरवगाथाएँ गढ़ने का हक़ तो है ही । राजाओं की अय्याशियों और आपसी फूट से दो जून की रोटी को तरसा आम नागरिक हज़ारों साल के अवसाद भरे दौर से मुक्ति को मनोरंजन के रूप में ही सही काल्पनिक नायक-नायिकाएँ तैयार करता है तो इसे अनुचित भी कैसे कहें ? मान लिया कि हम सत्य के ज़बरन दर्शन अपने इस समाज को करा कर ही दम लेंगे तब भी हमें उससे हासिल क्या होगा ? सत्य दर्शन की हमारी यह ज़िद तब हमारे सभी आराध्य देवी देवताओं की एतिहासिकता नहीं तलाशेगी ? हज़ारों साल की श्रुतियों से रचे समाज के सभी परामानव पात्र क्या इस ज़िद के आगे घड़ी भर भी टिक पाएँगे ? सवाल यह भी तो है कि कल्पनालोक में जी रहे हमारे समाज से उसका यह हक़ छीन कर भी किसी को क्या मिलेगा ? इतिहास को सुधारने की बजाय भविष्य पर फ़ोकस करना और आज के मसाईल पर बात करना हम कब शुरू करेंगे ? ज़रा यह भी देखें कि जिस संजय लीला भंसाली ने अपनी फ़िल्म पद्मावती से यह आग लगाई है वह किसी सामाजिक चेतना के लिए सौ करोड़ रुपए ख़र्च कर रहे हैं क्या ? यह उनका बिज़नस है और ठीक इसी तरह इस फ़िल्म के बहाने सामाजिक सौहार्द से छेड़छाड़ करने वालों का भी यह धंधा है । फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक को उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की सरकारें रुचि दिखा रही हैं उससे साफ़ दिख रहा है कि पद्मावती के बहाने वह क्या साध रहे हैं । अब हमें यह तलाशना है कि इस बहस में हम कहाँ हैं और आख़िरी बात एसी बहसें हमारे लिए कितनी ज़रूरी हैं ?

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