रहनुमाओं की अदा

रवि अरोड़ा
आज सुबह से मशहूर शायर दुष्यंत कुमार बहुत याद आ रहे हैं । एक दौर था जब साहित्य, समाज और राजनीति शास्त्र के सभी विद्यार्थियों को दुष्यंत की किताब ‘साये में धूप’ की तमाम गज़लें गीता कुरान की तरह कंठस्थ होती थीं । सातवें दशक के जेपी आंदोलन से लेकर अन्ना आंदोलन तक ऐसा कोई राजनीतिक सामाजिक मुहिम नहीं गुजरा जिसमें दुष्यंत कुमार के शेर पूरी शिद्दत से न गूंजे हों। बेशक आज भी दुष्यंत के चाहने वाले कम नहीं हैं मगर फिर भी हाल ही के वर्षों में राजनैतिक सामाजिक मूल्य जिस तेज़ी से बदले हैं , दुष्यंत कुमार जैसे लोगों और उनके कलाम को आम आदमी के जेहन से मिटाने के प्रयासों ने भी गति पकड़ी है । अब ये प्रयास कितने सफल होंगे यह तो पता नहीं मगर इतना तय है कि दुष्यंत कुमार के शेर आज के दौर में और अधिक मौजू होकर सामने आए हैं । अब दुष्यंत के इस शेर को ही लीजिए-
इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां।

दुष्यंत कुमार का यह शेर आज आपके सम्मुख रखने का एक खास कारण है । हाल ही में ऐसा बहुत कुछ मुल्क में गुजरा है जिन पर किसी बड़े राजनीतिक सामाजिक आंदोलन की उम्मीद की जानी चाहिए थी मगर कहीं पत्ता भी नहीं खड़का । हैरानी होती है कि क्या यह वही मुल्क है जो जरा जरा सी बात पर भी तीखी प्रतिक्रिया देता था । महंगाई तो जैसे उसे बर्दाश्त ही नहीं होती थी और मात्र प्याज के दाम बढ़ने पर वह सरकारें बदल देता था । झूठे वादे करने वालों से लोगों को ऐसी चिढ़ थी कि दुबारा उन्हें कभी सत्ता ही नहीं दी । राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय मामलों में भी जनता बेहद जागरूक थी और सन 1962 में चीन द्वारा दिए गए धोखे को उसने मुल्क के नहीं वरन पंडित नेहरू के खाते में डाला और आज तक उनकी नीतियों पर उंगलियां उठाती हैं । आपातकाल में लोगों पर जुल्म ढाने पर इंदिरा गांधी को भी जनता ने एक बार सत्ताच्युत कर दिया था । मगर कमाल है यही जनता अब गहरी नींद सो रही है ? उस पर अब किसी बात का असर नहीं होता ? महंगाई दो गुना बढ़े या तीन गुना उसे फर्क नहीं पड़ता । बेरोजगारी सारे रिकॉर्ड तोड़ दे तो भी उसे कोई चिंता नहीं सताती । एक नहीं दो नहीं सारी की सारी सरकारी कंपनियां बिक जाएं तो भी उसे कुछ लेना देना नहीं । विदेशी कर्ज बढ़ना तो खैर उसे कतई चिंतित करता ही नहीं । कोरोना से लाखों लोग मारे गए मगर मरने से पूर्व उन्हें इलाज की सुविधा देना तो दूर सरकार ने अपनी गिनती में उनका नाम तक शामिल करने की जहमत नहीं उठाई । अब विश्व स्वास्थ्य संगठन सरकार को बता रहा है कि भारत में इस महामारी से पांच लाख नहीं वरन पैंतालीस लाख लोग मरे थे मगर इस बात पर भी इस देश की महान जनता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । बेशक मरने वाले लोग भारतीय ही थे मगर उनके अपने भी उनकी मौत की हुई उपेक्षा से कतई उत्तेजित नही हुए । पिछले आठ साल में और उससे पूर्व हुए वादे तो शायद लोग ही भूल चुके हैं सो सरकार को याद दिलाने का तो सवाल ही नहीं । चीन हमारे मुल्क में कहां कहां घुसा बैठा है इसकी खबर जब सरकार को ही नहीं तो सारा दोष पब्लिक को भी कैसे दें ।

देख कर कई दफा हैरानी होती है कि सदा नेताओं को छकाने वाली इस देश की जनता अब इतनी उदासीन क्यों हो गई है ? माना आज के नेताओं में इतनी कूवत है कि वे गोल पोस्ट को जन सरोकारों से बदल कर धर्म कर देने की सलाहियत रखते हैं मगर इसकी भी तो कोई सीमा जनता ने तय की होगी या वाकई ये किसी अंतहीन सिलसिले की शुरुआत है ? खैर अपनी समझ तो सीमित है हम क्या कहें मगर हां दुष्यंत कुमार होते तो इस बात जरूर बहुत ऊंची आवाज़ में दोहराते-
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो ।

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