रपट पड़े तो हर हर गंगे

दूर से कैशलेस इकॉनमी का राग सुहाना सा लगता है मगर निकट जाते ही ज़मीनी हक़ीक़त डराने लगती है । बिना तैयारी के देश को कैशलेस इकॉनमी की ओर ले जाने के इनदिनो हो रहे प्रयासों पर अब चर्चा तो बनती ही है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

RELATED POST

नफरतों के ऑब्जेक्ट

रवि अरोड़ाहालांकि मैं अपने पर्स में हमेशा अपना आधार कार्ड रखता हूं मगर सुबह अखबार पढ़ने के बाद आज एक…

विधवा विलाप

रवि अरोड़ामुल्क का राजनीतिक तापमान चढ़ा हुआ है । काशी की ज्ञान वापी मस्जिद में शिवलिंग मिला है या फव्वारा…

किसान आंदोलन की वापसी

रवि अरोड़ाहवाओं में अब एक नए सवाल की आमद हो गई है । सवाल यह है कि क्या एक बार…

नंबर किस किस का

रवि अरोड़ानैनीताल जाते हुए हर बार रामपुर से होकर गुजरना ही पड़ता है । दो दशक पहले तक तो रामपुर…