रंगोली

रवि अरोड़ा

कुछ ख़रीदारी करने पॉश इलाक़े आरडीसी के गौड मॉल में गया था । बाहर कहीं पार्किंग न मिलने पर मॉल के पिछली तरफ़ कार खड़ी करने जाना पड़ा । लाखों रुपये फ़ुट के हिसाब से महँगे इस व्यवसायिक इलाक़े के ख़ाली भूखंडों पर थोक के भाव झुग्गियाँ पड़ी हैं । जब तक कोई बुलंद इमारत न बन जाए तब तक मज़दूर तबके द्वारा यहाँ अपनी कुटिया बना लेने को कोई अन्यथा भी नहीं लेता । बेशक आज यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह अट्टालिकाओं से भर गया है मगर एक दौर में शहर की सर्वाधिक झुग्गियाँ भी यहीं थीं । ख़ैर , कार खड़ी करने के लिए इन झुग्गियों के पास भी कोई उपयुक्त जगह नहीं मिली । वजह यह थी कि तमाम झुग्गियों के बाहर रंगों से कुछ कुछ मिथिला क्षेत्र की ख़ूबसूरत अरिपन कला सी सजावट हो रखी थी और इस सजावट को अपनी कार के गंदे टायरों से बिगाड़ने की हिम्मत मैं नहीं जुटा सका । उत्सुकता वश इस सजावट की तस्वीरें खींचने लगा तो मुझे कोई सरकारी अफ़सर समझ कर झुग्गी वाले बाहर आ गए । उन्हें भय था कि तस्वीर खिंचने का मतलब अब झुग्गी पर बुलडोज़र चलेगा । मैंने जब उन्हें बताया कि मैं आपकी झुग्गियों की नहीं वरन आपकी इस कला की तस्वीर खींच रहा हूँ तो राहत महसूस करने के साथ ये झुग्गीवासी प्रसन्न भी हुए ।

कभी कहीं पढ़ा था कि भित्ति चित्र का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की मानव का इतिहास । पौराणिक कथा है कि अपनी पुत्री सीता के विवाह के समय अपने महल और आस पास के क्षेत्र को सजाने की ज़िम्मेदारी राजा जनक ने मिथिला की महिलाओं को दी थी और उस इलाक़े यानि आज के बिहार और नेपाल के तराई क्षेत्र की महिलाएँ आज भी इसी मिथिला कला का संवाहक बनी हुई हैं । बेशक बिहार में इसे अरिपन, बंगाल में अल्पना, उत्तराखंड में थापी , उत्तर प्रदेश में चौक पूरना और महाराष्ट्र में रंगोली कहा जाए मगर कश्मीर से कन्या कुमारी तक यह कला किसी न किसी रूप में हर प्रांत में मिलती है । इतिहास कार इसकी छाप मोहन जोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति में भी पाते हैं । ख़ास बात यह है कि चावल , सिंदूर, रोली, हल्दी और सूखे आटे से की जाने वाली इस कला का हुनर हर जगह महिलाओं के पास ही है । बेशक मधुबनी पेंटिंग अब पैसे कमाने का भी ज़रिया है और इसमें पुरुष वर्ग भी स्थान बनाने की जुगत में है मगर न जाने एसी कौन सी वजह है कि देश की महिलायें यह कला जैसे लेकर ही पैदा होती हैं ।

एक परिचित आजकल अवसाद यानि डिप्रेशन से जूझ रहा है । डॉक्टर दवाइयों के साथ साथ एकपर्ट्स से काउन्सलिंग भी करवा रहे हैं । काउंसलर ने परिचित को एक मोटी सी कलरिंग बुक दी है जिसमें दुनिया भर की कलाकृतियों बनी हुई हैं और दिन में कम से कम एक घंटा इन कलाकृतियों में रंग भरने को कहा है । अब यह परिचित दिन भर रंग और यह कलरिंग बुक लेकर बैठा रहता है । जहाँ तक मैं समझा हूँ यह विद्वान काउंसलर रंगों को आनंद से जोड़ कर देख रहा है और कलाकृतियों को ख़ुशियों का बड़ा ज़रिया मान रहा है । शायद इसलिए ही उसने परिचित को कलरिंग बुक दी है । तो क्या हमारे पूर्वज इस बात हज़ारों साल पहले जान गए थे और उन्होंने अपने कपड़ों , दीवारों , भोजन और तमाम कलाकृतियों को चटक रंगों से जोड़ा ? हमारे इर्दगिर्द की उपेक्षित सी यह रंगोलियाँ क्या यही सबक़ तो देने हमारे बीच नहीं आतीं ? यदि एसा है तो हम इनका महत्व क्यों भूलते जा रहे हैं ? क्यों केवल दीपावली पर ही कुछ घरों तक ये रंगोलियाँ सीमित हो गई हैं ? लोक परम्पराओं को हम छोड़ते जा रहे हैं और लोककलायें विलुप्त हो रही हैं । यह कुछ एसा ही है जैसा लोकगीतों के साथ हुआ और शादी ब्याह के अवसर पर हमें भाड़े पर लोकगीत गाने वाले बुलाने पड़ते हैं । क्या करें लोकगीत गाने वालीं दादी नानी रहीं नहीं और नई पीढ़ी को लोकगीत आते नहीं । अब क्या एसा वक़्त भी आने वाला है कि बाज़ारवाद के इस दौर में हमें तीज त्योहार पर किसी ख़ास कम्पनी को अपने द्वार पर रंगोली बनाने के लिए बुलाना पड़ेगा ? यदि सचमुच एसा वक़्त आने वाला है तो शर्तिया ये काउंसलर लोग हम सबके हाथ में भी कोई कलरिंग बुक थमा देंगे और हम सब पेंसिलें बदल बदल कर आढ़ी तिरछी लकीरें खींच रहे होंगे । कोई लाल कोई पीली तो कोई हरी ।

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