ये घूरने वाले

रवि अरोड़ा

मेरा बेटा एक विवाह में शरीक होकर हाल ही में थाईलैंड के हुआहिन शहर से लौटा है । वहाँ विभिन्न देशों से आए अनेक अन्य विदेशी मेहमान भी थे । इन विदेशियों से भारत के बारे में जो बातचीत बेटे की हुई वह चौंकाने वाली थी । वे विदेशी भारतीयों को झगड़ालू और उद्दंड तो मानते ही थे मगर उन्हें सबसे अधिक नागवार गुज़रती थी हम भारतीय की घूरने की आदत । बक़ौल उनके आपके भारत में जिसे देखो वही आपको घूरता है । महिलाओं को तो लोगबाग़ आँखें फाड़ कर घूरते हैं और कपड़ों के भीतर तक उनकी निगाहें पहुँचने का प्रयास करती हैं । घूरने वाले बुर्क़े में भी आपको नहीं बख़्शते । सुन कर थोड़ी हैरानी हुई कि क्या अपने देश की छवि को लेकर हम लोग किसी ग़लतफ़हमी हैं ? हम तो ख़ुद को विश्वगुरु मानते हैं और स्वयं को दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता कहते हैं । तो क्या सचमुच हम एसे असंस्कारी ही हैं या यह चंद विदेशियों की राय है और हमें इसे गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए ?

बात घूरने की हो तो ब्रिटिश संस्था कोडैक लेंस विजन की रिपोर्ट याद आती है । यह रिपोर्ट दावा करती है कि पूरी दुनिया में पुरुष महिलाओं को घूरते हैं उनका यह घूरना प्रतिदिन औसतन 43 मिनट का होता है । अपने जीवन में पुरुष लगभग एक साल जितना समय महिलाओं को घूरने में गुज़ारते हैं और दिन भर में लगभग दस लड़कियों अथवा महिलाओं को घूरते हैं । वैसे अपने आसपास की दुनिया को देखें तो विदेशियों का हम भारतीय पर तंज सही जान पड़ता है , क्योंकि हम भारतीय तो सारा दिन यही काम करते रहते हैं और पूरी उम्र ‘ सौंदर्य दर्शन ‘ में गुज़ार देते हैं । हमारी इसी आदत से दुःखी सरकार ने 14 सेकेंड से अधिक किसी महिला को घूरने को अपराध की श्रेणी में डाल दिया है ।जरा सोचिये कि क्या यही वजह तो नहीं कि एतिहासिक , सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों से मालामाल होने के बावजूद दुनिया भर का मात्र एक फ़ीसदी पर्यटक ही भारत आता है ?

भारत क़ीमतों के आधार पर दुनिया का छठा सबसे सस्ता देश है मगर सुरक्षा की दृष्टि से हमारा स्थान 39वाँ है । हमारे ताज महल , स्वर्ण मंदिर , बहाई मंदिर , वन्य जीव , प्राकृतिक सौंदर्य , विश्व धरोहरें , साहसिक पर्यटन और समुंद्र के किनारे विदेशियों को बहुत पसंद आते हैं मगर फिर भी गत वर्ष मात्र एक करोड़ विदेशी ही भारत आए । आँकड़ों की दृष्टि से हम इस नज़र से 28वें स्थान पर हैं । वैसे इन लोगों में पाकिस्तान , बांग्लादेश , कनाडा और अन्य मुल्कों में रह रहे वे लोग भी शामिल हैं जो यहाँ अपने रिश्तेदारों से मिलने आए थे । पर्यटन के मामले में बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश भी हमसे कहीं आगे हैं । केवल एक फ़ीसदी पर्यटक हमारे हिस्से आने से भी हमारी चाँदी हो रही है और उन्ही की बदौलत पचास लाख लोग हमारे यहाँ रोज़गार पाते हैं जो कुल रोज़गार का आठ फ़ीसदी माना जाता है । पर्यटन का हमारे जीडीपी में 9.4 फ़ीसदी का योगदान है और बेतहाशा विदेशी मुद्रा भी हमें इससे मिलती है । अंदाज़ा लगाइए कि यदि हम पर्यटन के क्षेत्र में ही ढंग से काम कर लें तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच सकता है । ख़ास बात यह है विदेशी पर्यटकों को जो कुछ भी चाहिए वह सब हमारे पास है । अब तो मेडिकल टूरिज़्म भी बाँहें फैलाए खड़ा है । मगर हाय री हमारी घूरने की आदत , इसके कारण ही हम पिछड़ जाते हैं । अब हम कहें कि हम तो महिलाओं को प्रशंसा की दृष्टि से निहारते हैं मगर एसा नहीं है । हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब निहारते निहारते टकटकी लगा बैठते हैं और सार्वजनिक स्थानों पर हमारी निगाहें शिकार का पीछा करती हैं और दूर तक छोड़ कर आती हैं । मुआफ़ कीजिएगा हमें यह भी पता नहीं चलता कि कब हम फ़ब्तियों भी कस देते हैं । अब आप मुझे वह मेडिकल सर्वे मत बताइएगा कि ‘ सौंदर्य दर्शन ‘ से पुरुषों की उम्र बढ़ती है । जनाब ज़रा हिसाब तो लगाइए कि हमारी यह अदा मुल्क पर कितनी भारी पड़ रही है ?

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