मेरी जन्माष्टमी

रवि अरोड़ा
इस बार भी मैं जन्माष्टमी पर मंदिर नहीं गया । इस बार भी नाराज़गी अपने आराध्य कृष्ण से नहीं वरन कृष्ण भक्तों से थी । मंदिरों में जाकर देखूं भी तो क्या ? जहाँ देखो वहीं कृष्ण को छोटा करने का प्रयास चल रहा है । सब जगह बाल लीलाएँ , रासलीलाएँ और राधा-कृष्ण का प्रेम । कहीं भी योगेश्वर कृष्ण का ज़िक्र नहीं । कहीं भी उनकी सीखों की चर्चा नहीं । गीता के उपदेशों की कहीं कोई बात नहीं । उनका योद्धा रूप सभी जगह नदारद । जहाँ देखो वहीं सम्पूर्ण अवतार के अनुरूप आचरण तो दूर स्वयं उन्हें अपने अनुरूप ढालने की कोशिश । 64 कलाओं के ज्ञाता का इतना सरलीकरण ? 119 वर्ष तक पृथ्वी पर रहे विष्णु के आठवें और आख़री अवतार के शुरुआती ग्यारह वर्षों के जीवन पर ही हम क्यों अटक गए ? माना उन्होंने उस उम्र तक अनेक लीलाएँ कीं मगर दुनिया को बेहतर बनाने और सत्य के स्थापन का कार्य तो बाद में ही किया , उसकी चर्चा हम कब करेंगे ?
अब तो वैज्ञानिक गणनायें भी स्वीकार करती हैं कि कृष्ण का जन्म अब से 5235 वर्ष पूर्व हुआ था । महाभारत जब हुआ तब उनकी आयु पचपन वर्ष थी । अनन्त एश्वर्य , अनन्त यश , अनन्त वैराग्य और अनन्त ज्ञान के स्वामी कृष्ण ने इसी उम्र में दुनिया को सात सौ श्लोकों में समाहित गीता का उपदेश दिया । वेद और योग के मर्मज्ञ कृष्ण को उनके जीवन काल में ही सच्चिदानंद स्वीकार कर लिया गया । इस राग़ी और विरागी ने अपने अवतार होने को छुपाया भी नहीं और अर्जुन को अपने विराट रूप के दर्शन भी कराए । महाभारत में एक स्थान पर भीष्म पितामह भी स्वीकार करते हैं कृष्ण अच्युत हैं और सनातन कर्ता भी वही हैं । वही तीनों लोकों की उत्पत्ति और प्रलह के आधार हैं । एसे अपने आराध्य कृष्ण के साथ क्या कर रहे हैं हम ? यह ठीक है कि श्री चरणों के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ाने के उद्देश्य से मध्यकाल में भक्त कवियों ने उनकी लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया मगर हमने लीलाओं के इतर देखना ही क्यों बंद कर दिया? प्रेम कृष्ण का एक रूप है मगर वह प्रेमी के इतर भी तो बहुत कुछ हैं ।
विद्वान बताते हैं कि बारहवीं सदी में पहली बार जयदेव गोस्वामी ने अपने एक गीत में राधा का का ज़िक्र किया । बाद में दक्षिण के निम्बार्क सम्प्रदाय ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल रूप में उपासना प्रारम्भ की । आचार्य निम्बार्क का जन्म सन 1250 में हुआ । बाद में राधा वल्लभ सम्प्रदाय ने भी कृष्ण-राधा की आराधना प्रारम्भ की । इसके बाद चैतन्य , वल्लभ और सखीभाव सम्प्रदाय ने भी देवी के राधा रूप का वर्णन प्रारम्भ किया । हालाँकि महाभारत के रचयिता वेद व्यास ने अपने इस महाकाव्य में राधा का कहीं उल्लेख नहीं किया । भागवत पुराण समेत अन्य किसी पुराण में भी राधा नहीं हैं । विद्वान तो राधा को मध्यकाल के कवियों की कल्पना मात्र ही मानते हैं । हालाँकि इसमें कोई दो राय नही कि वैष्णवाचार्यों को अपने आराध्य की उपासना अपने अपने तरीक़े से करने का हक़ था और उन्होंने उसका भली भाँति उपयोग भी किया । मगर यह तो उनका भी नैतिक दायित्व था कि अवतारी कृष्ण का समाज़ोन्मुखी चेहरा आम लोगों की नज़रों से दूर ना हो । पिछला जाने भी दें तो कम से कम आज के धर्माचार्य तो कृष्ण की लीलाओं से आगे की बात लोगों को बतायें । और नहीं तो गीता के दर्शन की पुनर्स्थापना कराने में ही हाथ बटाएँ , जिसकी दुनिया को आज सख़्त ज़रूरत है । जिस कृष्ण के देह त्यागने के दिन से कलयुग का प्रारम्भ माना गया उसी कृष्ण के नाम पर धर्म का यह कलयुगी रूप मेरे इतर अन्य लोगों को भी शायद खलता होगा । क्या आपको नहीं खलता ?

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