मेरा जैन तेरा जैन

रवि अरोड़ा
दो तीन साल पहले प्रकृति प्रेम का कुछ ऐसा भूत सवार हुआ कि खेती में हाथ आजमाने की कोशिश करने लगा । खेती भी गुलाब के फूल की । किसी ने बताया था कि गुलाब के फूल से बहुत अच्छा इत्र बनता है और इसकी विदेशों में भी बहुत मांग है । इत्र की दुनिया को नजदीक से जानने के चक्कर में इत्र के सबसे बड़े बाजार यानी कन्नौज और कानपुर के भी मैं चक्कर काट आया । हालांकि देश के करोड़ों अन्य किसानों की तरह खेतीबाड़ी में मेरे हाथ भी घाटा आया और मेरे सिर से खेती का भूत उतर गया मगर इसी बहाने इत्र की दुनिया को देखने का अवसर जरूर मुझे मिल गया ।

इत्र की दुकानदारी भी अजब है । यहां सबकुछ नंबर दो यानी बिना बिल पर्चे के होता है । कम से कम भारत की तो यही सच्चाई है । गुलाब का असली इत्र पांच से बारह लाख रुपए किलो के भाव से विदेशों में बिकता है अतः व्यापारी बोतलों में भर कर बड़ी आसानी से इसे विदेश पहुंचा देते हैं । इससे न सरकार को टैक्स मिलता है और न ही विदेशी मुद्रा । सब कुछ हवाला के जरिए चलता है और इत्र की दुनिया में समानांतर अर्थव्यवस्था फलती फूलती रहती है । भीतर तक जाने से पूर्व मैं भी यही समझता था कि इत्र मतलब कपड़ों अथवा बदन पर छिड़की जाने वाली महक । मगर घुस कर तमाशा देखने से पता चला कि इत्र का असली खरीदार तो पान मसाला बनाने वाले बड़े खरीदार ही हैं । अब इस पान मसाला वालों की भी अलग दुनिया है । इस तरह के सभी प्रोडक्ट्स पर जीएसटी लागू होने के बावजूद भारी एक्साइज ड्यूटी भी देय होती है अतः यहां भी अधिकांश बिक्री नंबर दो में होती है । जब माल नंबर दो में बेचेंगे तो जाहिर है कि कच्चा माल भी नंबर दो में ही खरीदेंगे सो यहां भी अधिकांश इत्र बिना बिल पर्चे के बिकता है । कुछ ऐसा नेक्सेस विकसित हुआ है कि सरकारी संरक्षण में सालाना अरबों रुपया काला धन इस धंधे में पैदा होता है और आए दिन पीयूष जैन और पुष्पराज जैन जैसों के यहां रद्दी कागज की तरह बिखरा पड़ा मिलता है ।

अब पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है कि कानपुर में इत्र व्यवसाई के यहां पहला छापा गलती से पड़ा और सपा के पुष्पराज जैन की बजाय भाजपा ने अपने पीयूष जैन के यहां रेड करवा दी । मगर यह तो अब सारी दुनिया को पता है कि इस छापे में लगभग ढाई सौ करोड़ रुपए नकद और सोने के रूप में बरामद हुए हैं । हालांकि पुष्पराज जैन पीयूष जैन से बड़ा व्यापारी है मगर पहले छापे के बाद वह शायद सतर्क हो गया अतः उसके यहां से केवल चिल्लर ही मिला। उधर कानपुर और कन्नौज के बच्चे बच्चे की जबान पर है कि बरामद रकम तो कुछ भी नहीं यहां तो इससे भी बड़े बड़े मगरमच्छ बैठे हैं । ये सभी मगरमच्छ तमाम राजनीतिक दलों में सेटिंग रखते हैं और सभी को मोटा चंदा देते हैं । कुछ लोग तो यह भी दावा करते हैं कि कुछ बड़े राजनीतिक दल तो अपना काला धन भी इसी तरह के व्यापारियों के यहां छुपाते हैं और यदि गलती से पकड़ा जाए तो मजबूरी वश दूसरे दल का बताते लगते हैं । पुष्पराज जैन तो घोषित रूप से सपाई है और इस छापे के बाद यकीनन सपा में उसकी साख और बढ़ेगी । मगर मुसीबत तो पीयूष जैन जैसों की है , जिन्हे कोई अपना ही नही मानता । सच कहूं तो तरस आता है पीयूष जैन पर । सारी उम्र स्कूटर पर चल कर जिनके पैसों की देखभाल की वे ही अब मुंह चुरा रहे हैं । तेरा जैन मेरा जैन के चक्कर में मारा गया गुलफाम ।

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