मूर्तियाँ

रवि अरोड़ा

आज सुबह अख़बार में पूरे पेज का एक विज्ञापन देखा जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी की एक आदमक़द मूर्ति के पाँव छू रहे हैं । हालाँकि संदर्भ स्वच्छता था मगर मैं तो पाँव छूने की इस अदा पर ही अटक गया । अब देखिए राजनीति भी क्या क्या कराती है । जिस विचारधारा पर गांधी की हत्या के आरोप लगे उसी विचारधारा के संवाहक को अब ना केवल उनकी मूर्ति के पाँव छूने पड़ रहे हैं अपितु अपने इस कार्य को करोड़ों रुपए ख़र्च कर प्रचारित प्रसारित भी करना पड़ रहा है । हालाँकि मैं भली भाँति जानता हूँ कि मोदी ने गांधी को कभी नहीं देखा था । गांधी की हत्या के दो साल बाद ही उनका जन्म हुआ था मगर मैं कल्पना कर रहा हूँ कि यदि आज गांधी होते तो क्या मोदी उनके पाँव छूते ? जिस दर्शन एकात्म मानववाद को रट कर वे आज जहाँ तक पहुँचे हैं , क्या वह उन्हें इसकी इजाज़त देता ? शायद नहीं ना ? हाँ दुनिया से जा चुके आदमी की मूर्ति के पाँव छूने पर किसी को एतराज़ नहीं होता। मोदी जी को भी नहीं । अब इसमें मोदी जी का बड़प्पन मत ढूँढिए । यह बड़प्पन तो मूर्ति का है । मूर्तियों की यही तो ख़ासियत है वे विरोध नहीं करतीं । वे तो सिर्फ़ देती हैं । अपनों को ही नहीं विरोधियों को भी । तो फिर देश में ये मूर्ति भँजक कहाँ से आ गए ? क्यों आए दिन मूर्तियाँ टूट रही हैं ? कभी लेनिन की तो कभी अम्बेडकर की , कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तो कभी पेरियार की ?

वैसे इस सवाल का जवाब मैं अरसे से तलाश रहा हूँ कि हम मूर्तियाँ लगाते ही क्यों हैं ? माना हमारी संस्कृति पिछले दो ढाई हज़ार सालों से मूर्तियों की गिरफ़्त में है मगर हम देवताओं की मूर्तियों से फिसलकर नेताओं तक क्यों आ गए ? क्या सिर्फ़ पार्कों या चौराहों की शो पीस हैं ये मूर्तियाँ अथवा इनके बहाने हम अपनी जाति अथवा विचारधारा को पोषित करने की कोशिश करते हैं ? चलिए माना हम अपनी जाति अथवा विचारधारा की शिनाख्त इनमे ढूँढते हैं मगर फिर हम इन्हें तोड़ते क्यों हैं ? मूर्तियाँ तो किसी को कुछ नहीं कहतीं , किसी का कुछ नहीं बिगड़तीं ? तो फिर विरोधियों का कुछ बिगाड़ने की नीयत से हम उनकी मूर्तियों को क्यों बिगाड़ते हैं ? वार सीधा क्यों नहीं करते ? यह छद्म युद्ध क्यों ? क्या यह सारा का सारा युद्ध ही छद्म है ? किसी विचार पर काम मत करो बस उसके इतिहास पुरुष की मूर्तियाँ लगा लो , काम ख़त्म । किसी विचार का विरोध करना है तो मुक़ाबिल अपना विचार रखने के दूसरे विचार की मूर्तियाँ तोड़ दो , जीत हासिल । गांधी की विचारधारा के अनुरूप मुल्क में एक भी काम नहीं हुआ मगर पूरा देश गांधी की मूर्तियों से पाट दिया गया । देश के दलितों की हालत इंच भर भी नहीं सुधरी मगर गली-गली मोहल्ले-मोहल्ले अम्बेडकर की मूर्तियाँ सज गईं । पूरे दक्षिण में चौराहों पर पेरियार ही पेरियार नज़र आते हैं । भाजपा शासित राज्यों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और कम्युनिस्ट शासित राज्यों में सड़कों पर लेनिन का क़ब्ज़ा है । जिस ज़मीन को क़ब्ज़ाना हो उस पर मूर्ति लगा दो । मूर्तियों के नाम पर जिनके स्टेचू के बाज़ार सजे उनके विचारों पर कहीं बात नहीं होती । गोष्ठियाँ नहीं होतीं , उनपर किताबें नहीं छपती , फ़िल्में नहीं बनतीं । हाँ उनके जन्मदिनो पर हलवा पूड़ी ख़ूब बँटती है । मूर्तियाँ बेचारी क्या करें , वो तो विरोध भी नहीं कर सकतीं । फूल मालाओं से लदी मूर्तियाँ टुकुर टुकुर देखती रहती हैं कि कल तक गालियाँ देने वाले आज चराग जला रहे हैं । एक नई रेस और शुरू हो गई है मूर्तियों पर क़ब्ज़े की । सरदार पटेल और अम्बेडकर को भगवा रंग में रंगने के हम आप गवाह बन ही रहे हैं । मूर्तियाँ अब प्रॉपट्री हैं । प्रॉपर्टी तो ख़ैर हमें भी ये लोग अपनी मानते हैं । यह बात और है कि इसका पता अभी हमें नहीं चला है ।

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