माइक की दिशा
रवि अरोड़ा
धर्म ग्रंथों पर आए दिन हो रहे विवादों के बीच आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह बयान रौशनी की नई किरण लेकर आया है कि हिंदू धर्म ग्रंथों की समीक्षा होनी चाहिए। बकौल उनके इन ग्रंथों में कुछ ऐसी बातें भी जोड़ दी गई हैं जो धर्म के मूल में हैं ही नहीं। हालांकि हिंदू धर्म के ऐसे ही विवादित तथ्यों पर समाज और धर्म को दूषित करने वाले लोग भी खुद को संघ का हिस्सा कहते हैं मगर फिर भी मोहन भागवत ने जो कहा उसका स्वागत तो होना ही चाहिए। देश, समाज और धर्म, क्षेत्र कोई भी हो परिमार्जन के बिना आगे बढ़ भी कैसे सकता है ? भागवत की बातों का यदि सही सही अनुपालन हो तो एक बार फिर साबित हो जायेगा कि हिंदू ही दुनिया का वह इकलौता धर्म है जो लकीर का फकीर नहीं है और समय समय पर खुद को सुधारता भी रहता है। आज जब पूरी दुनिया में एक भी ऐसा धर्म नहीं है जो अपनी धार्मिक पुस्तक में एक भी शब्द की समीक्षा का हामी हो, ऐसे में दुनिया के बड़े हिंदू धर्म की सबसे बड़ी पैरोकार संस्था का प्रमुख अपने धर्म की पुस्तकों पर ऐसी बात कहे तो यह बात मामूली नहीं है। हालांकि यहां यह सवाल अनुत्तरीन ही दिखता है कि इस समीक्षा का आधार क्या होगा , कौन कौन से ग्रंथ की समीक्षा होगी, कौन करेगा यह समीक्षा और कैसे तय होगा कि कौन सा तथ्य ग्रन्थ में बाद में जोड़ा गया अथवा कौन सा पुरातन है ? वगैरह वगैरह ।
भागवत ने बिलकुल ठीक कहा कि भारतीय धर्म का मूल आधार श्रुतियां ही हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने ईश्वर, प्रकृति, आत्मा और पुनर्जन्म जैसे विषयों पर उस समय में ही श्लोक रच दिए थे जब लेखन परम्परा शुरू भी नहीं हुई थी। चारों वेद और तमाम उपनिषद उसी काल खंड के हैं । ऋषि मुनियों ने जो कहा वह सीना दर सीना ही अगली पीढ़ियों तक पहुंचे। तमाम भारतीय दर्शन और उनमें प्रमुख षट दर्शन में जो कहा गया वही हमारे सनातन धर्म यानि हिंदू धर्म का आधार बनीं। उसी दौर में नास्तिकता का भी एक विचार चार्वाक के रूप में सामने आया एक धारा के रूप में आज भी जीवित है मगर आमतौर पर ईश्वर के निराकार और कहीं कहीं साकार अस्तित्व को स्वीकार कर ही लिया गया । हालांकि बाद में मन्दिर और मूर्ति पूजा जैसी बातें भी बौद्धों और जैनियों के प्रभाव में आकर इसमें आ जुड़ीं। संभवतः उसी दौर में ऐसा ऊल जलूल साहित्य भी धर्म के नाम पर परोस दिया गया जो सनातन धर्म का हिस्सा कतई हो ही नहीं सकता था । मनु स्मृति और अनेक पुराण भी इसी मिलावट की उपज हैं। उसी दौर में धर्म को लेकर इस हद तक का दिवानगी समाज के सिर पर सवार हुआ कि उसने साहित्यिक रचनाओं को भी धार्मिक ग्रंथ मान लिया । राम चरित मानस, रामायण और महाभारत इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। इन्हीं रचनाओं के कुछ हिस्से प्रचारित कर समय समय पर विवाद उत्पन्न किया जाता है।
भागवत जी उस संगठन के प्रमुख हैं जिसके हाथ में केन्द्र की सत्ता की लगाम है। अजब विडंबना है कि केन्द्र में बैठी यह सत्ता मन्दिर मस्जिद और हिंदू मुस्लिम का वह राग ही हरदम अलापती है, जो सनातन धर्म का हिस्सा ही नहीं है। सनातन धर्म तो विमर्श, वाद विवाद, मत भिन्नता, पक्ष विपक्ष और शास्त्रार्थ को बढ़ावा देने वाला रहा है और विविधता उसके मूल में ही है मगर आज सत्ता की पिछलग्गू वानर सेना ही इस विविधता की सबसे बड़ी दुश्मन है। न जाने क्यों वे धर्म के नाम पर सबको एक ही सांचे में ढालना चाहते हैं ? क्या ही अच्छा हो कि भागवत जी कुर्सी पर बैठे इन लोगों को भी बुला कर कभी यह समझाएं कि हिंदू धर्म के नाम पर असली मिलावट तो आप लोग कर रहे हैं। धर्म ग्रंथों की समीक्षा से भी अधिक जरूरी है उन लोगों को धर्म का मर्म समझाना जो धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं। क्या ही अच्छा हो कि भागवत जी का माइक कभी उस दिशा में भी घूम जाए ।